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Monday, November 2, 2020

 की ठंडक बढी

आसमान में जब  चन्दा चमका

कभी छोटा कभी बड़ा वह बारबार रूप बदलता

पन्द्रह दिन में पूर्ण चन्द्र होता 

नाम कई  तरह के रखे  गए उसके

कभी गुरू पूर्णिमा कभी शरद पूर्णिमा

जब शरद  ऋतू में जब आती

इसका बड़ा महत्त्व होता

स्वास्थ्य की दृष्टि  से इस रात

अमृत वर्षा होती आसमान से

कई रोगों के उपचार में बड़ी सहायक होती |

शरद पूर्णिमा की रात होती जश मनाने की

मान सरस्वती की आराधना की

गीत संगीत की महफिल सजती

रात्री जागरण होता नृत्यों का समा बंधता |

आधी रात तक का समय

कैसे बीत जाता पता ही नहीं चलता

फिर चलता अमृत से भरी खीर पान  का

या केशरिया दूध पीने का |

आज भी जब कोरोना की कुदृष्टि है सब ओर

जश्न फीका फीका रहा

ना कविता का दौर चला ना ही नृत्य उत्सव हुआ

गाने थोड़े से  सुन पाए

 गहमागहमी से दूर रहे

खैर इस साल की शरदपूर्णिमा भी बीती फीकी

आने वाले  त्योंहारों का क्या  होगा ईश्वर  जाने

कब इस महामारी से छुटकारा मिलेगा

आनेवाले त्योहारों की रौनक लौटेगी |

आशा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कहने को कोई बात नहीं है

पर है भण्डार विचारों का

जिन्हें एक घट में किया संचित

कब गगरी छलक जाए

यह भी कहा नहीं जा सकता

पर कभी बेचैन मन इतना हो जाता है

कह भी नहीं पाता ठोकर लगते ही

छलकने लगता गिरने को होता

ऐसी नाजुक  स्थिति में बहुत शर्म आती है

कहानी अनकही जब उजागर हो जाती है |

पर कब तक बातें मुंह तक आकर रुक जातीं

मन ही मन बबाल मचाती रहतीं

चलो अच्छा हुआ मन का गुबार निकल गया

फिर से मुस्कान आई है चहरे पर |

किसी ने सच कहा है स्पष्ट बोलो

मन से अनावश्यक बातों को निकाल फेंको

मन दर्पण सा हो साफ

तभी जीवन होगा सहज

 भविष्य भी सुखमय बीतेगा |

 

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