*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Thursday, August 27, 2020

प्रकृति तेरे रूप अनेक

हे   देवी  तू   जीवनदाता
अन्न जल प्राण तुझीसे आता
तू सागर है ,तू पहाड़ है
तू हरियाली ,तू उजाड़ है
तू पतझड़ ,तू नए पान है
तू कोकिल का मधुर गान है
तू उपवन की महक निराली
चहक पक्षियों की तू प्यारी
शीतल बहती ,मस्त पवन तू
रिमझिम बरसे ,वो सावन तू
तू नदिया की कलकल सुन्दर
तू चांदी  सा ,झरता निर्झर
तू उगते सूरज की लाली
तेरी है हर बात निराली
चंदा तू ही ,तू ही सितारे
तू सतरंगी ,बादल प्यारे
तू ही ग्रीष्म ,तू ही है सरदी
तू ही है  महीना  बासंती
तू भीगा मौसम बरसाती
होती उग्र ,बाढ़ तू लाती
जो तू है तो ही जीवन है
तुझ से ही तो ऑक्सीजन है
पर्यावरण ,धरा का सारा
हमने तुझको छेड़ बिगाड़ा
भूल हुई हमसे ये भारी
गलती कर दो क्षमा हमारी
करना तेरी देख रेख है
प्रकृति तेरे रूप अनेक है 

No comments: