*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Thursday, March 5, 2020

बढ़ती उम्र की पीड़ा

उम्र ज्यों ज्यों हो रही है तीव्रगामी
हो रहा मन ,कुटिल,लोभी और कामी
घट रहा अब ओज तन का ,दिन ब दिन है  
क्षरित तन, मन की न कर पाता  गुलामी

भले मन में हौंसला  ,तन खोखला है  
शांत रहता ,अब न आता जलजला है
लालसा तज ,बन न पाया, बुद्ध ये मन
क्रुद्ध खुद पर इसलिये ये हो चला है
 
चाहता है उडूं ,पर ये उड़ न पाता
फड़फड़ाता पंख ,लेकिन छटपटाता
याद करता  दिन सुहाने वो उड़न के ,
विचरता  था  गगन में ,गोते लगाता
 
याद कर बीते हुए वो मदभरे  दिन ,
शेष स्मृतियों  में रहे वो सुनहरे  दिन
लाख पुनःरावर्ती करना चाहता पर ,
लौट फिर आते नहीं  वो  रसभरे  दिन

मौन है मजबूर मन खुद को   मसोसे
भाग्य को या उमर को ,वो  किसे कोसें
भूख  पर तन ,ना चबा ,ना पचा पाता  ,
भले  थाली  सामने , व्यंजन परोसे

बड़ा ही मन को कचोटे  ,ये विवशता
जिंदगी में आ गयी है एकरसता
क्या पता था ,देखने ये दिन पड़ेगे ,
भाग्य पर मन कभी रोता कभी हँसता

दुखी हो मन ,बाल सर के नोचता है
राम में मन रमाने की सोचता है
जाय मिट बेचैनियां  और मिले शांति ,
रास्ता वह उस जगह का खोजता है

ह्रदय की अठखेलियां है रामनामी
लालसाये हुई अब  पूरणविरामी
पीत पड़ती जारही सारी चमक है ,
हो रहा है अब प्रभाकर क्षितिजगामी

अरे यह नियति  नियम ,दस्तूर है  
किया करता सबको जो मजबूर है
क्यों परेशां हो रहे हो व्यर्थ में ,
वो ही होगा रब को जो मंजूर है

मदनमोहन बहती 'घोटू '

No comments: