*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Monday, November 4, 2019

एक लड़की  को देखा तो ऐसा लगा

 

कल मैंने फिर एक लड़की देखी

पचास साल के अंतराल के बाद

मुझे है याद

पहली ड़की तब देखी थी जब मुझे करनी थी शादी

ढूंढ रहा था एक कन्या सीधी सादी

मैं उसके घर गया

मेरे लिए ये अनुभव था नया

वैसे तो कॉलेज के जमाने में खूब लड़कियों को छेड़ा था

काफी किया बखेड़ा था

पर उस दिन की बात अलग थी इतनी

मैं ढूंढ रहा था अपने  लिए एक पत्नी

थोड़ी देर में ,

हाथ में एक ट्रे में  चाय के कप लिए ,

वो शरमाती हुई आई

थोड़ी डगमगाती हुई आई

चाय के कप आपस में टकरा कर छलक रहे थे

उसके मुंह पर घबराहट के भाव झलक रहे थे

थोड़ी देर में वो सेटल हुई और चाय का कप मेरी ओर बढ़ाया

मैं भी शरमाया,सकुचाया और मुस्काया

फिर चाय का कप होठों से लगाया  

तो उसकी मम्मी ने फ़रमाया

चाय बेबी ने है खुद बनाई ,

आपको पसंद आई

बेसन की बर्फी लीजिये बेबी ने ही बनाया है

इसके हाथों में स्वाद का जादू समाया है

मैंने लड़की से पूछा और क्या क्या बना लेती हो ,

लड़की घबरा गयी ,भोली थी

बोली कृपया क्षमा करना ,मम्मी झूंठ बोली थी

मम्मी ने कहा था की लड़का अगर पूछे किसने बनाया ,

तुम झूंठ बोल देना ,पर मेरा मन झूंठ नहीं बोल पाता

पर सच ये है कि किचन का काम मुझे ज्यादा नहीं आता

ये चाय मैंने नहीं बनाई है

और बर्फी भी बाजार से आई है

उसकी इस सादगी और सच्चाई पर मैं रीझ गया

प्रेम के रस भीज गया

उसकी ये अदा ,मेरा मन चुरा गयी

और  वो मेरे मन भा  गयी

और एक दिन वो मेरी बीबी बन कर गयी

बाद में पता लगा कि ये सच और झूंठ का खेल ,

सोचा समझा प्लान था

जिस पर मैं हुआ कुर्बान था

जिसने लड़की की कमजोरी को खूबसूरती से टाल दिया

और उस पर सादगी का पर्दा डाल दिया

पचास वर्षों के बाद  ,

मैं अपने बेटे के लिए लड़की देखने गया था कल

मिलने की जगह उसका घर नहीं ,

थी एक पांच सितारा होटल

लड़की डगमगाती हुई हाथ में चाय की ट्रे लाइ

शरमाई

बल्कि आर्डर देकर वेटर से कोल्ड कोफ़ी मंगवाई

अब मेरा कॉफी किसने बनाई पूछना बेकार था

पर मैं उसके कुकिंग ज्ञान को जानने को बेकरार था  

जैसे तैसे मैंने खानपान की बात चलाई पर

इस फील्ड के ज्ञान में भी वो मुझसे भारी थी

उसे 'मेग्गी' से लेकर 'स्विग्गी' की पूरी जानकारी थी  

फिर मैंने ऐसे मौको पर पूछे जानेवाला,

 सदियों पुराना प्रश्न दागा

क्या तुम पापड़ सेक सकती हो जबाब माँगा

उसने बिना हिचकिचाये ये स्पष्ट किया

वो जॉब करती है और प्रोफेशनल लाइफ के दरमियाँ

बेलने पड़ते है कितने ही पापड़

तभी पा सकते हो तरक्की की सीढ़ी चढ़

जब ये पापड़ बेलने की स्टेज निकल जायेगी

पापड़ सेकने की नौबत तो तब ही आएगी

जबाब था जबरजस्त

मैं हो गया पस्त

मैंने टॉपिक बदलते हुए पूछा 'तुम्हारी हॉबी '

उसने अपने माँ बाप की तरफ देखा

और उत्तर फेंका

मैं किसी को भी अपने पर हॉबी नहीं होने देती हूँ

घर में सब पर मैं ही हाबी रहती हूँ

और शादी के बाद ये तो वक़्त बताएगा

कौन किस पर कितना हॉबी रह पायेगा

हमने कहा हॉबी से हमारा मतलब तुम्हारे शौक से है

वो बोली शौक तो थोक से है

देश विदेश घूमना ,लॉन्ग ड्राइव पर जाना

मालों में शॉपिंग ,होटलों  में खाना

सारे शौक रईसी है

उनकी लिस्ट लंबी है

हमने कहा इतने ही काफी है

इसके पहले कि मैं कुछ और पूछता ,

उसने एक प्रश्न मुझ पर दागा

और मेरा जबाब माँगा

आप अपने बेटे बहू के साथ रहेंगे

या उन्हें अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने देंगे

और बात बात में उनकी लाइफ में इंटरफियर करेंगे

ये प्रश्न मेरे दिमाग में इसलिए आया है

क्योंकि मुझे देखने जिसे शादी करनी है वो नहीं आया है

आपको भिजवाया है

प्रश्न सुन कर मैं सकपकाया

क्या उत्तर दूँ ,समझ में नहीं आया

मैंने कहा ये सोच नाहक है

हर एक को स्वतंत्रता से जीने का हक़ है

हम भला बच्चों की जिंदगी में टांग क्यों अड़ायेगे

अपने अपने घर में अपनी अपनी मल्हार जाएंगे

हम भी अपनी आजादी और सुख देखेंगे

और किसी को अपने पर हॉबी नहीं होने देंगे

वो तो उत्सुकता वश हम तु म्हे देखने गए ,

 

No comments: