*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Wednesday, October 16, 2019

Aआत्मदीप 

लो फिर से आगयी दीवाली 
मेरे मन के दीप्त दीप पर 
उस प्रदीप पर 
काम क्रोध के 
प्रतिशोध के 
वे बेढंगे 
कई पतंगे 
षट रिपु जैसे थे मँडराये
मुझ पर छाये
पर मैंने तो 
उनको सबको 
बाल दिया रे 
अपने मन से 
इस जीवन से 
मैंने उन्हें निकाल दिया रे 
मगन मैं जला 
लगन से जला 
और मैंने शांति की दुनिया बसा ली 
लो फिर से आगयी दिवाली 

No comments: