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Monday, October 28, 2019

अवशेष

फूटे हुए पटाखों के अवशेष
चिंदा चिंदा रह गए शेष
कल जो बोल रहे थे बड़े बड़े बोल
आज खुल गयी है उनकी पोल
 वो जो बहुत ऊंचे उड़ रहे थे कल
आज अस्तित्वहीन है, निर्बल
और वो फूलझड़ी
कल जो फूल बिखेरती हुई ,
इतरा रही थी बड़ी
आज काली सी जली जली
कचरा बन एक कोने में है पड़ी
कोई कितने ही बड़े बोल बोले ,
कोई कितना भी उड़े
कितने ही गुल खिलाये
भले आज उसकी कीमत हो लाखों की
पर सबकी नियति होनी है ,
फूटे हुए पटाखों सी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 

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