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Monday, April 22, 2019

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जवानी में जो हम पर प्यार बरसाती थी झर झर झर
मोहब्बत का प्रदर्शन जो किया करती थी ख़ुद बढ़ बढ़
बुढ़ापे में आज कल वो किया
करती है बस बड़ बड़
नहीं चुप बैठती हरदम
बका करती है अब बुढ़िया
बुढ़ापे में बहुत ही तंग
किया करती है अब बुढ़िया

हमेशा रहती सजधज कर
अदा से मुस्कुराती थी
पका कर नित नये पकवान
जो हमको खिलाती थी
न जाने कौन सी घूटी
पिलाई आ बुढ़ापे ने
हमारी मौज मस्ती सब गयी
बदली सियापे में
कहो उससे अगर कुछ तो
सुनाती एक की दस है
है कैंची सी ज़ुबान चलती
नहीं उस पर कोई बस है
हमारी छोटी ग़लती भी
पकड़ लेती है अब बुढ़िया
बुढ़ापे में बहुत हाई तंग
किया करती है अब बुढ़िया

गये वो दिन जब हम छूते
उसे रोमांच हो जाता
ज़रा सा अब उसे छूलो
उसे ग़ुस्सा बहुत आता
बिगड़ कहती ये छोड़ो चोंचले
अपनी उमर देखो
राम का नाम लो ,भगवतभजन
भी थोड़ा कर देखो
झेलते रोज ही ये सब
हो गयी एसी है गड़बड़
हमें अब उसकी बड़ बड़ की
एक आदत सी गयी है पड़
हमारा मन नहीं लगता
अगर चुप रहती जो बुढ़िया
बुढ़ापे में बहुत ही तंग
किया करती है अब बुढ़िया

घोटू

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