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Thursday, March 22, 2018

मैं गृहस्थन हो गयी हूँ 

अदाएं कम हो गयी है 
शोखियाँ भी खो गयी है 
सदा सजने संवरने की ,
अब रही फुरसत नहीं है 
        रोजमर्रा काम इतने ,
       व्यस्त हरदम हो गयी हूँ 
        मैं गृहस्थन  हो गयी  हूँ 
गए वो कॉलेज के दिन ,
गयी चंचलता चपलता 
मौज मस्ती का वो मौसम ,
आज भी है मन मचलता 
ठेले के वो गोलगप्पे ,
केंटीन के वो समोसे 
बंक करके क्लास,पिक्चर 
देख ,खाना इडली,दोसे 
था बड़ा मनमौजी जीवन, 
उमर थी कितनी सुहानी 
लेना पंगे हर किसी से ,
और करना छेड़खानी 
नित नए फैशन बदलना 
फटी जीने ,टॉप झीने 
आशिकों की लाइन लगती,
तब बड़ी बिंदास थी मैं  
      वो बसंती दिन गए लद ,
       सर्द  मौसम  हो गयी हूँ 
        मैं गृहस्थन हो गयी हूँ 
मस्तियाँ सब खो गयी है ,
हुआ बिगड़ा हाल तब से 
बन के दुल्हन ,आयी हूँ मैं ,
शादी कर ससुराल जब से 
पति मुझमे ढूंढते है ,
अप्सरा का रूप प्यारा 
सास मुझसे चाहती है ,
करू घर का काम सारा  
ससुर की है ये  अपेक्षा ,
बहू उनकी करे सेवा 
ननद ,देवर सभी की ,
फरमाइशें है ,जानलेवा 
सभी को संतुष्ट रखना ,
और सबके संग निभाना 
भूल कर संस्कार बचपन 
के नए रंग,रंग जाना 
       ना रही  मैं एक  बच्ची ,
      अब बढ़प्पन हो गयी हूँ 
      मैं  गृहस्थन हो गयी हूँ 
एक तरफ प्यारे पियाजी ,
प्यार है  अपना  लुटाते 
एक तरफ कानो में चुभती ,
सास की है कई बातें 
नवविवाहित कोई दुल्हन ,
उमंगें जिसके हृदय में 
सहम कर सब काम करती,
गलती ना हो जाय,भय में 
कुशलता से घर चलाना ,
बढ़ी जिम्मेदारियां है 
अचानक बिंदासपन पर,
लग गयी पाबंदियां है 
संतुलन सब में बिठाती ,
राजनीति  सीखली है 
सभी खुश रहते है मुझसे ,
चाल कुछ ऐसी चली है 
       बात पोलाइटली  करती,
        पॉलिटिशियन हो गयी हूँ 
       मैं गृहस्थन हो गयी  हूँ 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

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