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Monday, March 12, 2018

मुझे याद आती है दादी 

जब याद आता मुझको बचपन 
बात बात पर जिद पर आना 
पल पल रोना और चिल्लाना 
मुझको  कौन मनाया करता 
दे मिठाई ,बहलाया करता 
अपनी गोदी में थपकी दे   
मुझको कौन सुलाया करता 
हाँ ये सच है ,शुरू शुरू में,
ये सब कुछ करती थी अम्मा 
पर जब छोटी बहन आ गई,
व्यस्त हो गई उसमे अम्मा 
उस पर घर के कामधाम से,
उसके पास समय था इतना कब बच पाता 
सब बच्चों का ख्याल रख सके ,
थक जाती वह इतनी ज्यादा 
और उन दिनों हम दो और 
हमारे दो का ,नहीं नियम था
हर एक घर में पांच सात बच्चों 
के होने का फैशन था  
तो बच्चो का ख्याल अधिकतर ,
तब घर में ,दादी रखती थी 
सब बच्चों पर प्यार लुटाती ,
दादी कभी नहीं थकती थी 
हम उसके ही साथ लिपट कर,
लोरी सुनते,सो जाते थे 
वो ही हमको दूध पिलाती ,
उसके हाथों से ही हम खाना खाते थे
नहाना धोना वस्त्र पहनना ,
हमको दादी ने सिखलाया  
ऊँगली पकड़ी,हमे चलाया 
पहला अक्षरज्ञान  करवाया  
भाई बहन के कई आपसी ,
झगड़ों को उसने सुलझाया 
सब बच्चों की जिद पूरी की,
प्यार किया,हमको दुलराया 
बड़े प्यार से पाला ,पोसा 
मांग हमारी ,पूर्ण करेगी ,
दादी ही,था हमे भरोसा 
खुश होती तो मन बहलाने 
टॉफी या गुब्बारा लाने 
चोरी चुपके दे देती थी ,
हमको आने या दो आने 
उसकी आँखों में ममता का ,
था भंडार,उमड़ता लगता 
कहती उसे मूलधन से भी ,
ब्याज अधिक है प्यारा लगता 
होता अगर हमारा झगड़ा ,
गली मोहल्ले के बच्चों से 
तो वह आगे बढ़ लेती थी 
डाट पिलाती उन बच्चों को ,
और उनकी अम्मा दादी से ,
भी जाकर वो लड़ लेती थी 
हाँ वो प्यारी बूढी दादी 
बाल रुई से गोरा रंग था 
धुंधलाई सी उसकी आँखें ,
जिनमे केवल प्यार बरसता 
अपने हाथों,बना हमें गुड़िया बहलाती 
फटे पुराने कपड़ों से थी गेंद बनाती 
आसपास कोई फंक्शन में ,
अगर बुलावा आता था तो ,
जाती थी,गाने थी गाती  
लड्डू बंटते ,ले आती थी 
बड़े प्रेम से हमें खिलाती 
जब हम करते  थे शैतानी 
हमें मार पड़ती थी खानी 
डांट  मार से हमें पिताजी ,
की थी वो ही हमें बचाती 
हम उसकी गोदी में छिपते ,
उन्हें रोक कर  वो समझाती
और बदले में हमसे केवल ,
अपने हाथ पैर दबवाती 
जब खुश होकर वह मुस्काती 
अपना टूटा  दांत दिखाती 
भोलीभाली,सीधी सादी 
मुझे याद आती है अक्सर ,
वो प्यारी प्यारी सी दादी 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू'

1 comment:

PBCHATURVEDI प्रसन्नवदन चतुर्वेदी said...

बहुत सुन्दर रचना....बहुत बहुत बधाई...