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Tuesday, January 30, 2018

मैं भीग भीग जाती हूँ


बिना मौसम बरसात के
जब बादल छा जाते हैं
जब भी फुहार आती है     
मैं भीग भीग जाती हूँ 
मन से भी तन से भी 
कितना भी ख्याल रखूं 
बच नहीं पाती 
जाने कहाँ से विचार आते हैं 

  

बिना मौसम बरसात के
जब बादल छा जाते हैं
जब भी फुहार आती है     
मैं भीग भीग जाती हूँ 
मन से भी तन से भी 
कितना भी ख्याल रखूं 
बच नहीं पाती 
जाने कहाँ से विचार आते हैं 
मन से टकरा कर चले जाते हैं 
न जाने क्यों बैर है मुझसे 
न आने की खबर देते हैं 
न जाने की सूचना 
बस मन की वीणा के 
तार छेड़ जाते हैं |
आशा
  

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