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Saturday, February 11, 2017


इस कदर गुजरती हैं आजकल रातें

होती हैं अब खुद की खुद से ही बातें

एक बूँद भी इनायत ना हुई हमें

गुजार दी मयखाने में हमने तमाम रातें.

 

 

 

© रविश 'रवि'

raviishravi@blogspot.com



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