*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Saturday, June 25, 2016

कहीं देर न होजाये

         कहीं देर न होजाये

याद है अच्छी तरह से ,हमे अपने बचपन में ,
आसमा देखते थे ,नीला नीला लगता था ,
आजकल धुंधलका इतना भरा फिजाओं में ,
मुद्द्तें हो गई ,वो  नीला आसमां न दिखा
अँधेरा होते ही जब तारे टिमटिमाते थे,
घरों की छतों पर आ चांदनी पसरती थी ,
चांदनी में पिरोया करते सुई में धागा ,
पूर्णिमा का मगर ,वो वैसा चन्द्रमा न दिखा
थपेड़े मार कर ठंडी  हवा  सुलाती थी ,
सुनहरी धूप,सुबह ,थपकी दे जगाती थी,
चैन की नींद जितनी हमने सोयी बचपन में ,
क्या कभी ,फिर कहीं ,हमको नसीब होगी क्या
वो बरसती हुई सावन की रिमझिमें ,जिसमे,
भीग कर ,कूद कूद,नाचा गाया करते थे ,
वक़्त ने इस तरह माहौल बदल डाला है,
कभी कुदरत ,हमारे ,फिर करीब होगी क्या
इस कदर हो गया भौतिक है आज का इन्सां ,
दिनों दिन बढ़ती ही जाती है भूख पाने की ,
आज के दौर  में,ये दौड़ ,होड़ की अंधी ,
सभी छोड़ पीछे ,लोग भागते  आगे
हवाओं में कहीं इतना जहर न भर जाए ,
सांस लेने में भी हम सबको परेशानी हो,
अभी भी वक़्त है ,थोड़ा सा हम सम्भल जाएँ ,
देर हो जायेगी ,अब भी जो अगर ना जागे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

No comments: