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Thursday, July 30, 2015

मैं ढूंढ रहा उस लड़की को

               मैं ढूंढ रहा उस लड़की को

मैं कल अपनी पत्नी जी को,था बड़े गौर से ताक रहा
उनकी आँखों में आँख ड़ाल ,उनके अंतर में झांक रहा
वो बोली क्या करते हो जी,क्यों देख रहे हो घूर घूर
मैं वो ही तुम्हारी बीबी हूँ  ,ना कोई  अप्सरा, नहीं हूर
अब नहीं हमारी उमर रही ,ऐसे यूं आँख लड़ाने की
धुँधली आँखे,ढलता चेहरा ,जरुरत क्या नज़र गड़ाने की 
मैं बोला ढूंढ रहा हूँ मैं ,एक लड़की, बदन छरहरा था
जिसकी आँखों में लहराता ,उल्फत का सागर गहरा था
जब हंसती थी तो गालों पर ,डिम्पल पड़ जाया करते थे
जिसके रक्तिम से मधुर अधर,मुझको तड़फ़ाया करते थे
रेशम से बाल बादलों से,हिरणी सी आँखें चंचल थी
जो भरी हुई थी मस्ती से ,मदमाती,प्यारी ,सुन्दर थी
हंसती थी फूल खिलाती थी,वह भरी  हुई थी यौवन से
मैं ढूंढ रहा वह प्रथम प्यार,जिसको मैंने चाहा  मन से
जिस यौवन रस में डूब डूब ,मैंने जीवन भरपूर जिया
वह कहाँ खो गयी इठलाती , मनभाती मेरी प्राणप्रिया
क्या वो तुम ही थी,नहीं,नहीं,वो लड़की तुम ना हो सकती
नाजुक पतली कमनीय कमर ,ऐसा कमरा ना हो सकती
वह कनकछड़ी इतनी थुल थुल ,ना ना ये है मुमकिन नहीं
क्या सचमुच वो लड़की तुम हो, ये आता मुझे यकीन नहीं
तुम तो कोई की नानी माँ,  कोई की लगती दादी हो
अम्मा हो या फिर किसी बहू की सासू सीधी  सादी हो
उलझी इस तरह गृहस्थी में ,तुमको अपना ही होश नहीं
तुम अस्त व्यस्त और पस्त रहो,तुममे वो वाला जोश नहीं
सेवा में पोते पोती की  ,तुम पति की सेवा भूल गयी
अपना कुछ भी ना ख्याल रखा ,तुम दिन दिन दूनी फूल गयी
मैं ढूंढ रहा उस लड़की को ,मैं जिसे ब्याह कर लाया था
जिसने तन मन से प्यार किया ,अपना सर्वस्व लुटाया था
क्या बतला सकती तुम मुझको,खो गयी कहाँ,वो कहाँ गयी
पत्नीजी हंस कर यूं बोली, मैं वही ,सामने  खड़ी ,यहीं
ये सब करतूत तुम्हारी है ,जो मेरी  है ये  हालत कर दी
आहार प्यार का खिला खिला ,इतनी खुशियां मुझ में भरदी
मेरा स्वरूप जो आज हुआ  ,ये  सब  गलती तुम्हारी है
क्या कभी आईने में तुमने,अपनी भी शकल निहारी है
उड़ गए बाल आधे सर के ,ढीले ढाले से लगते हो
पर तुम जैसे भी हो अब भी ,उतने ही प्यारे लगते हो
सच तो ये है ,मैं ना बदली,नज़रें तुम्हारी बदल गयी
 अब भी मुझमे ढूँढा करते ,सकुचाती दुल्हन नयी
ये मत भूलो  बढ़ रही उमर ,यौवन ढलान पर है आया
ना तुममे जोश बचा उतना,मेरा स्वरूप भी कुम्हलाया
,पर मैं ही तो हूँ वो लड़की ,जिससे तुमने की थी शादी
तुम ही वो प्रेमी हो जिन संग,थी जीवन डोर कभी बाँधी
यदि वो ही दिवाने आशिक़ बन ,कर करीब तुम आओगे
तुम वही पुरानी प्यार भरी , लड़की मुझमे  पा जाओगे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

1 comment:

Rangraj Iyengar said...

सुंदर वर्णन