*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Sunday, September 21, 2014

मगर हम किस से कहें

      मगर हम किस से कहें

रोज वो हमको सताते ,मगर हम किस से कहें
छेड़तें है आते जाते   ,मगर हम  किस से  कहें
दिखा  कर के लुभाने वाली अदाएं रात दिन ,
छेड़तें है  मुस्कराते ,मगर हम किस से कहें
लहराते चुम्बन हवा में ,कभी करते गुदगुदी ,
हमारे दिल को जलाते,मगर हम किस से कहें
पङ गयी आदत हमें है उनके इस व्यवहार की,
 सहते है हम मुस्कराते  ,मगर हम किस से कहें 
क्या बनाया इश्क़ तूने,क्या बनाई औरतें,
जाल में हम फसे जाते ,मगर हम किस से कहें
चाहते हम उनको इतना ,बिना उनके एक पल ,
भी जुदा  हम रह न पाते,मगर हम किस से कहें
उनकी मीठीमीठी बातें,मन में है रस घोलती ,
हम भी झट से पिघल जाते ,मगर हम किस से कहें
सामने आँखों के आती,उनकी सूरत चुलबुली ,
ठीकसे हम सो न पाते ,मगर हम  किस से कहें

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

No comments: