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Wednesday, July 30, 2014

हम ऐसे फूल हैं ख़िज़ाँ में महकेंगे ख़ुश्बू सदा बनके ।

मेरी ख़ुद्दारी पे बन आई है खुदा खुद्दार बनाये रखना
क़ुर्बान जाऊँ इसपे लाज परवरदिगार बचाये रखना ,

क़ाईल मौजे हवा से हूँ वो बदलते मौसम से हो गए 
चेहरा-ए-अय्याम देखे कमाल बेदार इसी से हो गए ,

सई-ए-मुक़र्रर को सहने की अब ताब नहीं मुझमें 
तज़कारा से क्या फायदा कोई अब चाव नहीं उनमें ,
  
उनकी फितरत ही ऐसी खुदशनास भी होंगे खुद से 
यही अज्ज होता है रस्मो-राह रखना रज़ील रुत से ,

कैसे सैय्याद हैं दहर में समय से जान लिया अच्छा 
ऐसे सुकूत से ज़िंदगी को निजात मिल गया अच्छा ,

अवारगाने-शहर में वो रूप का ज़ेवर सजाये रक्खें  
ग़लतफ़हमियों के आईने में ये तेवर सजाए रक्खें ,

शाहकार बहुत दहर में ख़ुदा की इनायत सदा हमपे 
हम ऐसे फूल हैं ख़िज़ाँ में महकेंगे ख़ुश्बू सदा बनके । 

क़ाईल--संतुष्ट ,चेहरा-ए-अय्याम--लोगों के चेहरे 
सई-ए-मुक़र्रर--किसी होनी के दुबारा घटने का अंदेशा 
तज़कारा--बहस करना ,चर्चा ,खुदशनास-- खुद को पहचानना 
अज्ज--परिणाम ,रस्मो-राह--वास्ता रखना ,रज़ील--क्षुद्र ,नीच 
सैय्याद--शिकारी ,सुकूत--व्यवहार ,हयात--जीवन ,
अवारगाने-शहर--शहर में आवारा घूमने वाले।,

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