*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Monday, June 30, 2014

पराये का मज़ा

              पराये का मज़ा

पराई चीज का लेना मज़ा हमको सुहाता है,
              पराया चाँद ,पर हम चांदनी का सुख उठाते है
पराया सूर्य है पर धूप का आनंद लेते हम,
              पराये बादलों की रिमझिमो में भीग जाते है
पराये घर की लड़की  को ,बनाते अपनी घरवाली ,
              उसी के साथ फिर हम जिंदगी सारी  बिताते है
पराई थालियों में सबकी,घी ज्यादा नज़र आता ,
              पराई नार को हम प्यार कर, सुन्दर बताते है
परायों की छतों पर झांकने में मज़ा मिलता है,
              पराये माल को हम देख कर ,लालच में आते है
भले ही हो फटा कितना,हमारा ही गिरेबां पर,
              परायों के फटे में झाँकने पर सुख उठाते   है 
हमारे जिगर के टुकड़े ,बाँध बंधन परायों से ,
              ये ही देखा है अक्सर वो ,पराये हो ही जाते है 
पराये लोग कितनी बार अपनों से भी बढ़ कर के,
               आपका साथ देते जबकि अपने भूल जाते  है  
प्यार के बोल दो बस बोलते 'घोटू'हमेशा ही ,
                प्यार पाते परायों से,उन्हें अपना बनाते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

1 comment:

देवदत्त प्रसून said...

लम्बी अवक्धिके बाद अभिवादन !
अच्छी व्यंग्य पंक्तियाँ हैं !