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Thursday, March 6, 2014

फटा हुआ बनियान न देखा

       फटा हुआ बनियान न देखा

चेहरे पर मुस्कान भले पर,
कितना घायल है अन्तर तर
अपने मन की पीर छुपाये,
                 एक टूटा इंसान न देखा
तुमने उजला कुरता देखा,
         फटा हुआ बनियान न देखा
सिर्फ आवरण देखा लेकिन ,
               अंदर घुटता मन ना देखा
ढोलक की थापों पर नाचे,
                उसका खालीपन ना देखा
 सुन्दर ,मोहक ,बिछे गलीचे
कितनी  गर्द   छुपी है नीचे  ,
शायद तुम्हे पता भी होगा ,
               पर बन कर अनजान न देखा
तुमने उजला कुरता देखा ,
                फटा हुआ बनियान न देखा  
सावन की बूंदों में भीजे ,
               जब रिमझिम कर बरसा पानी
फटा कलेजा जिस बादल का ,
                तुमने उसकी पीर न जानी
जिस तरु से हो पत्ते बिछड़े
जिसका दिल हो टुकड़े टुकड़े ,
तुमको सिर्फ बसंत दिखी पर ,
               पतझड़ का अवसान न देखा
तुमने उजला कुरता देखा ,
                फटा हुआ बनियान न देखा

मदन मोहन बाहेती'घोटू '

1 comment:

प्रेम सरोवर said...

प्रभावकारी प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है। धन्यवाद।