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Saturday, February 8, 2014

हम नेता हैं

         हम नेता हैं

हम नेता है,हम न किसी के सगे हुए है
जोड़ तोड़ कर ,बस कुर्सी से टंगे  हुए है
जनता के सेवक खुद को तो  कहते है पर,
खुद अपनी ही सेवा में हम लगे हुए है
मीठी मीठी बातें कर सबको बहलाते,
क्योंकि चाशनी में असत्य की पगे हुए है
आश्वासन की लोरी सुन ,सोती है जनता ,
और हम उसको ,थपकी देते ,जगे हुए है
हम भी तो है,इस जंगल के रहनेवाले ,
है तो वो ही सियार ,मगर हम रंगे  हुए है
लाख कोशिशें करते जनता को ठगने की,
पर सच ये है,हम  अपनों से ठगे  हुए है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

2 comments:

प्रेम सरोवर said...

वसंत उत्सव की बहुत -बहुत बधाई । सुंदर रचना । मेरी कविता "समय की भी उम्र होती है" पर सुदर प्रतिक्रिया देने के लिए आप आमंत्रित हैं।

देवदत्त प्रसून said...

वसंत-काल की सभी मित्रों को कोटि कोटि मीठी मीठी वधाइयां !
आप की यह रचना सटीक एवं रोचक है !