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Wednesday, November 27, 2013

प्रत्याशी





भीड़ तंत्र का एक भाग
घूम घूम करता प्रचार
पूर्ण शक्ति झोंक देता
चुनाव जीतने के लिए |
है वह आज का नेता
आज ही उतरा सड़क पर
लोगों से भेट करने
बड़ी बड़ी बातें करने |
वह थकता नहीं सभाओं में 
प्रतिपक्ष की पोल बता
झूठे वादे करते
अपनी उपलब्धियां गिनवाते |
है केवल एक ही चिंता उसे
जितनी पूंजी झोंक रहा है
अगले पांच वर्ष में
 कैसे चौगुनी होगी |
कुर्सी से चिपके रहने की युक्ति
देशहित को परे हटाती  
वह खोज रहा अपना भविष्य
आने वाले कल में |
आशा

4 comments:

Sriram Roy said...

शानदार और जानदार कविता।।।।।।
www.sriramroy.blogspot.in

Asha Saxena said...

टिप्पणी हेतु धन्यवाद |
आशा

Vaanbhatt said...

मुनाफे कि आदत है...इन्वेस्टमेंट पे रिटर्न चाहिए ही...

दे४व्दुत्तप्रसून said...

शुभ प्रात:काल !अच्छी रचना है !!सटीक व्यंग्य है !!!