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Thursday, November 28, 2013

                                     'जीवन राग'

न जाने किस बला की नज़र लग गई है 
मस्ती  भरा  आलम  कहीं  खो  गया  है 
किलकारियों   को  ग्रहण  लग  गया  है
न  जाने आकर्षण   कहाँ   सो  गया   है।   

जहाँ  जूही , चम्पा  सुवास  कि  चमेली
मरुभूमि   बन   गई   मन   कि   हवेली 
प्रेम  राग  रूठे  अन्तर्मन  के घोंसलों से  
कंटीली कंछियाँ फूटीं मन के अंचलों से। 

चिंताओं ,तनावों  कि  घेरि  आई  बदरी
प्रेम कि  धरा पर  रेगिस्तान  रेत पसरी 
अरमान  सूखे ,सूखीं  रसपगी  भावनाएं  
वक्त  के  परों  पर  उड़   विलीन करुनाएं। 

जीवन में जरुरत फिर से राग रंग भरना 
मन की स्वच्छ वेदी आहूत विकार करना 
आन्तरिक सफाई करके पौधे संस्कार कि 
सुन्दर पुष्प खिल सकें रोपें सूखी संसार की।

बड़े-बड़े  मॉल ,शहर ,कालोनी चौड़ी सड़कें
दब ना जाये मानवता इसी मोह में सिमट के
प्रगति की हूँ पक्षधर विकास यात्रा का उद्देश्य भी
सीमित साधनों में डर खो न जाये मूल उद्देश्य ही ।

मंहगे मोटरकार,बंगले चिंताग्रस्त फिर इंसान क्यों
सुविधाएँ,साधन सम्पूर्ण फिर भी मन अशान्त क्यों 
भवनों में रहने वाले बीमार खिन्न क्यों हैं आजकल
हँसता,मुस्कुराता दिखता क्यों नहीं कोई आजकल।

नींद नसीब नहीं गुदगुदे सजे बिस्तरों पर
नींद कि खा  गोलियां सो रहा इन्सान हर 
भवन भौतिक संसाधन सड़कें क्या बनाकर
कि पीछे छूट जाये मानवता यह विकास कर।

बाजारवाद,भौतिकवाद बस अर्थ कि प्रधानता
संवेदनशून्य हुए हम  मोह ,माया में संलिप्तता
कैसी  विडंबना ये  जप ,तप , ज्ञान ,मान दान
मृग मरीचिका सी तृष्णा में भूले सब उपादान ।

गाँव ,देश ,प्रान्त का उत्थान हो ,हो भावना
सपनों कि शैय्या पर अरमान ऐसे पालना
हो अंतःकरण से स्वस्थ प्रगति  का पदार्पण
तभी होंगे आनन्दित ले सुःख का रसास्वादन।
                 
                                                     शैल सिंह  

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