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Thursday, August 29, 2013

है डालरों से हम

               है डालरों से हम

बचपन से जवानी  तलक ,पाबंदी थी लगी ,
                ना स्कूलों में ऊँघे और ना दफ्तरों में हम
पर जबसे आया बुढ़ापा ,हम रिटायर हुए,
                 जी भर के ऊंघा  करते है ,अपने घरों में हम
बीबी को मगर इस तरह  ,आलस में ऊंघना ,
                  बिलकुल नहीं पसंद है ,रहती  है डाटती ,
कहती है दिन में सोने से  ,जगते है  रात को,
                    सोने न देते ,सताते,है बिस्तरों में  हम
अब ये ज़माना आ गया ,घर के घाट के,
                     अंकल जी कहके लड़कियां ना घास डालती,
कितने ही रंग लें बाल  और हम फेशियल  करें,
                      उड़ने का जोश ला नहीं ,सकते परों में हम
टी वी से या अखबार से अब कटता वक़्त है,
                        घर का कोई भी मेंबर ,हमको न पूछता ,
पावों को छुलाने की बन के चीज रह गए,
                         त्यौहार,शादी ब्याह के ,अब अवसरों में हम
हम दस के थे,डालर की भी ,कीमत थी दस रूपये ,
                          छांछट का है डालर हुआ ,छांछट के हुए हम,
फिर भी  हमारे बच्चे है  ,इतना न समझते ,
                             होते ही जाते कीमती, है डालरों से  हम

मदन मोहन बाहेती'घोटू;  

1 comment:

Lalit Chahar said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
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हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} के शुभारंभ पर आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट को हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल में शामिल किया गया है और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा {रविवार} (01-09-2013) को हम-भी-जिद-के-पक्के-है -- हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल चर्चा : अंक-002 पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें। कृपया पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | आपके नकारत्मक व सकारत्मक विचारों का स्वागत किया जायेगा |
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सादर ....ललित चाहार