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Monday, July 8, 2013


नाता जाने कब का




माँ है धरती
और पिता नीलाम्बर
दूर क्षितिज में
मिलते दौनों
सृष्टि उपजी है दौनों से  
|धरा पालती जीवों को
पालन पोषण उनका करती
खुद दुखों तले दबी रहती
उफ नहीं करती  
पर जब क्रोध आता उसको
कम्पित भूकंप से हो जाती
कभी ज्वालामुखी हो
फूटती मुखर होती | 
पर फिर धीर गंभीर हो जाती
क्यूं कि वह पृथ्वी है
अपना कर्तव्य जानती है
उसी में व्यस्त हो जाती है | 
आकाश निर्विकार भाव लिए
उसे निहारता रहता है
पर वह भी कम यत्न नहीं करता
सृष्टि को सवारने के लिए
जग जगमगाता है
उसी के प्रकाश से |
 हर जीव के विकास में
होता पूर्ण सहयोग दौनों का
रात्री में चाँद सितारे
देते शीतलता मन को
और विश्रान्ति के उन पलों को
कर देते अधिक सुखद | 
दौनों ही संसार के
संचालन में जुटे हैं
गाड़ी के दो पहियों की तरह
एक के बिना
दूसरा लगता अर्थ हीन सा
अधूरा सा
हैं दौनों जीवन के दाता
पञ्च तत्व के निर्माता
है ना जाने उनका
नाता जाने कब का | 
आशा

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

Asha Saxena said...

धन्यवाद शास्त्री जी |
आशा

संजय भास्‍कर said...

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति,सुंदर रचना,,,साझा करने के लिए आभार