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Sunday, June 23, 2013

हे गंगाधर!


हे शिव शंकर!
श्रद्धानत भक्तों की भारी भीड़ देख कर,
आप इतने द्रवीभूत हो गए,
कि आपका दिल बादल सा फट पड़ा 
आपने तो अपनी जटाओं मे ,
स्वर्ग से अवतरित होती गंगा के वेग को,
वहन कर लिया था ,
पर हम मे इतना सामर्थ्य कहाँ,
जो आपकी भावनाओं के वेग को झेल सकें,
आपने बरसने के पहले ये तो सोचा होता 
भस्मासुर कि तरह वरदान देकर ,
कितनों को भस्म कर दिया 
मंद मंद बहनेवाली मंदाकिनी को,
वेगवती बना दिया
अपनी ही मूर्ती को ,गंगा मे बहा दिया 
हे गंगाधर !
आपने ये क्या किया ?
मदन मोहन बाहेती'घोटू ' 

2 comments:

shyam gupta said...

स्वयं को भी नहीं बक्सता वह न्याय के पथ पर |
चलता रहा मानव ये क्यों अन्याय के पथ पर|
उसने भला कब मान रख्खा प्रकृति-ईश्वर का,
अब प्रश्न उठाता ईश के कर्तव्य के पथ पर |


Ghotoo said...

sundar-dhanywaad