*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Thursday, June 13, 2013

बाल श्रमिक

तपती धूप , दमकते चहरे
श्रमकण जिनपर गए उकेरे
काले भूरे बाल सुनहरे 
 भोले भाले नन्हे चेहरे 
 जल्दी जल्दी हाथ चलाते 
थक जाते पर रुक ना पाते
उस पर भी वे झिड़के जाते ,
सजल हुई आँखे , पर हँसते ,
मन के टूटे तार लरजते |

आशा

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (14-06-2013) के "मौसम आयेंगें.... मौसम जायेंगें...." (चर्चा मंचःअंक-1275) पर भी होगी!
सादर...!
रविकर जी अभी व्यस्त हैं, इसलिए मंगलवार की चर्चा मैंने ही लगाई है।
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद प्रसाद said...


बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

latest post: प्रेम- पहेली
LATEST POST जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !

अरुणा said...

अपराध है लेकिन कौन मानता है

सुन्दर रचना