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Wednesday, May 8, 2013

माँ से

तेरी एक निगाह ही काफी थी
गलत कदम रोकने को
 तब तुझे कभी  न समझा
दुश्मन  सी लगती थी |
दूर रही अक्सर तुझसे
तेरी ममता ना जानी
याद्र रहा तेरा अनुशासन
प्यार की उष्मा ना जानी |
 अब छोटी बड़ी घटनाएं
मन व्यथित करतीं
 हर पल याद तेरी आती
मन चंचल करती|
तेरी सारी  वर्जनाएं
जो कभी बुरी  लगती थीं
वही आज रामवाण दवा सी
अति आवश्यक  लगतीं |
कितने कष्ट सहे होंगे माँ
मुझे बड़ा करने में
तुझसे ही है वजूद मेरा
अब मैंने जाना  |
 कभी कोई शिकवा न शिकायत
आई तेरे चेहरे पर
तूने मुझे लायक बनाया
क्यूं न करू गर्व उस पर |
जब अधिक व्यस्त होती हूँ
बच्चों की नादानी पर
उनके शोर शराबे पर
बहुत क्रुद्ध होती हूँ |
 मन के शांत होते ही
तेरा शांत सौम्य मुखमंडल
निगाहों में घूम जाता है
सोचती हूँ माँ तुझ जैसा धैर्य
मुझ में क्यूं नहीं  ?
मैंने बहुत कुछ पाया
पर तुझ जेसे गुण नहीं|
आशा 



8 comments:

shalini rastogi said...

बिल्कुल सही लिखा है आशा जी ... मां की बातें बाद में ही याद आती हैं .. बेहद भावपूर्ण रचना!

Asha Lata Saxena said...

टिप्पणी हेतु धन्यवाद शालिनी जी |

Ranjana verma said...

माँ जैसी कोई नहीं... माँ पर दिल को छूने वाली सुंदर रचना !!

अज़ीज़ जौनपुरी said...

बिल्कुल सही, भावपूर्ण सुंदर रचना

Sadhana Vaid said...

बहुत सुंदर कविता जीजी ! मम्मी की याद आ गयी !

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति. ....

Guzarish said...

माँ की ममता बाद में ही याद आती है

Asha Lata Saxena said...

टिप्पणी हेतु धन्यवाद आप सब को |
आशा