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Friday, May 3, 2013

जहाँ के लोग प्रेम ना जाने चीज क्या मरी हो जिस अन्तस्तल की करुणा





सरबजीत मसले पर यह आक्रोश फुटा है,गफलत में एक निरपराध  इंसान को सोची समझी नीति के तहत अमानुषिक तरीके से काल के गाल में झोंकना ......
           १-
कैसी वो सरजमीं है जहाँ हैवानियत बसी
कैसी वो सरजमीं जहाँ इन्सान में इंसानियत नहीं
न चैन से रहना न चैन के भाषा की समझ है
सारे संसार में मचा रखा है तहलका
क्या मंसूबा क्या इस फितरत की ख्वाहिश
जिनके ताबड़तोड़ आतंक से है विश्व दहलता ।
            २-
उस माँ की कोंख कलंकित है
जो अपने ही जाये औलादों को
नैतिकता की तालीम नहीं देती ।

नफरत,कहर बरपाती संस्कारों से 
करतीं पल्लवित,पोषित,पुष्पित
प्रेम,सौहार्द्र शिक्षा जालिम नहीं देती ।

छाती के क्षीर में ही साजिश शामिल
लड़ातीं खुदा के वास्ते खुदा के बन्दों को
खुदा का वास्ता ही जाहिल नहीं देती।

 




2 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति !!

Shail Singh said...

dhanyavad sangita ji