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Thursday, April 25, 2013

साजिश किसी की


खतरा सर पर मंडराया
दिन में स्वप्न नजर आया 
किरच किरच हो बिखरा
वजूद उसका शीशे सा
न जाने कब दरका
अक्स उसका आईने  सा
अहसास न हुआ
टुकड़े कब हुए
यहाँ वहाँ बिखरे
दर्द नहीं जाना
स्वप्न  में खोया रहा
जब हुई चुभन गहरे तक
दूभर हुआ चलना
रक्त रंजित फर्श पर
तब भी नादाँ 
पहचान  नहीं पाया
वह थी साजिश किसी की
दिल को दुखाने की
उसको फंसाने की |

4 comments:

देवदत्त प्रसून said...

हनुमान जयंती की वधाई!
काश देश में घिनौनी हराक़तें कुछ थम जायें |
आप की यह रचना अच्छी है |

Asha Lata Saxena said...

टिप्पणी के लिए धन्यवाद आपको |इसी तरह मेरे बल्ग आकांक्षा पर भी आएं |
आशा

vandan gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (27 -4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

Asha Lata Saxena said...

सूचना हेतु धन्यवाद वन्दना जी |
आशा