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Monday, April 15, 2013

वरिष्ठ नागरिक संगठन

                 वरिष्ठ नागरिक संगठन

मिल के सब बूढ़े इकट्ठे हो गये  
इस बहाने हंसी ठट्ठे   हो  गये
ढलते सूरज में  चमक सी आ गयी ,
दांत तन्हाई के    खट्टे  हो गये
याद  कर बीती जवानी की उमर ,
सब के सब फिर जवां  पट्ठे हो गये
दूसरों की सुनी ,अपनी भी कही ,
रोज के सब दूर   रट्टे  हो  गये
एक से दुःख,दिक्कतें ,गम,एक ही ,
थैली के सब  ,चट्टे  बट्टे हो गये
लगे जब से खाने है  ताज़ी  हवा ,
देख लो ,सब हट्टे कट्टे हो गये
दही थे,मख्खन जवानी में गया ,
अब तो सेहतमंद  मठ्ठे  हो गये
खाने थे जो जवानी में खा लिये ,
'घोटू 'अब अंगूर  खट्टे हो   गये

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 



2 comments:

Devdutta Prasoon said...

बैसाखी के साथ 'देवी स्कन्द माता दिवस'दोनों की वधाई !!
व्यंग्य बहुत जी अच्छा है |

कविता रावत said...

खाने थे जो जवानी में खा लिये ,
'घोटू 'अब अंगूर खट्टे हो गये
...बहुत सही ..
..एक न एक दिन यही होता है..