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Friday, April 5, 2013

प्रेम का मर्म

हृदय पात्र में प्रेम अक्षुण  द्रव्य है 
निःस्वार्थ अनुराग निर्द्वन्द बरसाइये 
कभी चुकता नहीं श्रोत सूखता नहीं 
प्रेम की पावन गंगा अविरल बहाइये । 

गुनगुनी धुप सी मखमली दूब सी 
गलीचा प्रेम का गुदगुदा बिछाइये 
तन थके मन थके प्रेम थकता नहीं 
नेह का निर्झर श्रोता कलकल गिराइये । 

ना समझौता जाने ना प्रतिबन्ध माने 
शुचिता से उमड़ती ना जाने अभाव 
प्रेम गहरी नदी उसका बहता बहाव 
रोके रुकता नहीं ये उसका स्वभाव । 

हर आनन्द की पराकाष्ठा आ छू लें 
प्रेम की पेंग से प्रेम रिमझिम फुहार 
मन की हर तलाश प्रेम से पूर्ण होती 
मोक्ष मुक्ति की है प्रेम ही हर लिबास । 

कभी असफल हो जाओ अगर प्रेम में 
मानकर तुम क्षणिक दोष दो ना कभी 
पास परमात्मा के प्रिये गर है जाना 
गूढ़ विषय उर का ना ये खोना कभी । 

मर्म गर जान ले परम प्रेम का ये जहाँ 
शरण बेखटके प्रभु के पहुँच जायेगा 
जानने की कभी कुछ ना कोशिश करो 
प्रेम द्रव्य जितना बहाओ बहा जायेगा।  
                          
                                   शैल सिंह 


6 comments:

Unknown said...

प्रेम का मर्म !
---------------
पंक्ती प्रति पंक्ती जैसे शब्द भाव के कुंदन से चमक दमक रहे है !

बहुत ही मर्मस्पर्शी लेखन !

सार्थक लेखन !
आपकी अभिव्यक्ती को सिंह जी, शत शत नमन !
सादर !
अनुराग त्रिवेदी -एहसास

Unknown said...

प्रेम का मर्म !
---------------
पंक्ती प्रति पंक्ती जैसे शब्द भाव के कुंदन से चमक दमक रहे है !

बहुत ही मर्मस्पर्शी लेखन !

सार्थक लेखन !
आपकी अभिव्यक्ती को सिंह जी, शत शत नमन !
सादर !

Asha Lata Saxena said...

हर पंक्ति नए विचारों में डूबी| उम्दा रचना |
आशा

मुकेश कुमार सिन्हा said...

wah bahut khub..........

shailrachanablogspotin said...
This comment has been removed by the author.
shailrachanablogspotin said...

बहुत ख़ुशी हुई और होती है,जब पाठक हृदय से पढ़ते हैं और सराहना करते हैं ,इससे लेखक और लेखनी को बहुत प्रोत्साहन मिलता है ,आप सभी को मेरा सादर धन्यवाद