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Saturday, February 9, 2013

सौन्दर्य बोध

गीत हजारों बार सुने
चर्चे भी कई बार किये
सच्ची सुंदरता है क्या
इस तक न कभी पहुँच पाये
तन की सुंदरता तो देखी
मन की सीरत न परख पाये
ऐसा शायद विरला ही होगा
जो तन से मन से सुंदर हो
सुंदर सुंदर ही रहता है
मन से हो या तन से हो
यदि कमी कोई ना हो
फिर शिव वह क्यों ना कहलाये
यह तो दृष्टिकोण है अपना
किसको सुंदर कहना चाहे
जिसको लोग कुरूप कहें
वह भी किसी मन को भाये
आखिर सुंदरता है क्या
परिभाषा सुनी हजारों बार
जो प्रथम बार मन को भाये
सबसे सुंदर कहलाये
नहीं जरूरी सब सुंदर बोलें
विशिष्ट अदा को सब तोलें
जिसने चाहा और अपनाया
उसने क्या पैमाना बनाया
तन की सुंदरता देखी
मन को नहीं माप पाया
जिसने जिस को जैसे देखा
अपने मापदण्ड से परखा
उसको विरला ही पाया
अन्यों से हट के पाया
जब आँखें बंद की अपनी
कैद उसे आँखों में पाया
तन तो सुंदर दिखता सबको
मन को कोई न समझ पाया
ऐसा कोई नाप नहीं
जो सच्चा सौंदर्य परख पाता
सबने अपने-अपने ढंग से
सुंदरता को जाँचा परखा
ख़ूबसूरती होती है क्या
कोई भी नहीं जान पाया
यह तो अपनी इच्छा है
किसको सुंदर कहना चाहे
वही मापदण्ड अपनाये
जो उसके मन को भाये |


आशा


Sadhana Vaid ने कहा…
आपने बिलकुल सही लिखा है !
यह तो द्रष्टिकोण है अपना, किसको सुन्दर कहना चाहे,
जिसको लोग कुरूप कहें ,वह भी किसी मन को भाये !
Beauty lies in beholder's eyes.
सच्ची सुंदरता तन की नहीं मन की होती है जो अपने साथी के ह्रदय को मोहती है !
लता 'हया' ने कहा…
शुक्रिया आशा जी ;
आप मुझ से बड़ी हैं ;तजुर्बे में ,काम में; क्या कहूँ?लेकिन 'मानसिकता' अच्छी लगी और सौंदर्य बोध सुंदर .
संजय भास्कर ने कहा…
मन के भाव बहुत खूबसूरती से लिखे हैं....और भाषा की मिठास तो क्या कहिये...

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