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Sunday, February 24, 2013

एक सुरमई शाम

एक सुरमई शाम

सुरमई शाम छलकते जाम 
साथ हाला का और मित्रों का
  फिर भी उदासी गहराई
अश्रुओं की बरसात हुई
सबब उदासी का 
जो उसने बताया 
था तो बड़ा अजीब पर सत्य
रूठ गई थी उसकी प्रिया
की मिन्नत बार बार 
वादे भी किये हजार
पर  नहीं मानी 
ना आना था ना ही आई 
सारी  महनत व्यर्थ हो गयी 
वह कारण  बनी उदासी का 
 तनहा बैठ एक कौने में
कई जाम खाली किये
डूब  जाने के लिए हाला  में
पर फिर  से लगी आंसुओं की झाड़ी 
वह  जार जार रोता था 
शांत  कोइ उसे न कर पाया
उदासी से रिश्ता वह तोड़ न पाया 
बादलों  के धुंधलके से बच नहीं पाया
वह अनजान   न था उस धटना से
दिल का दर्द उभर कर
हर बार आया
उदासी  से छुटकारा न मिल पाया
 उस   शाम को वह
खुशनुमा बना नहीं पाया |
आशा 

6 comments:

Dr. sandhya tiwari said...

sundar rachna ..........

अज़ीज़ जौनपुरी said...

khoobshurat prastuti

shalini rastogi said...

बहुत सुन्दर आशा जी!

Dinesh pareek said...

नया आयाम देती आपकी ये बहुत उम्दा रचना ..भाव पूर्ण रचना .. बहुत खूब अच्छी रचना इस के लिए आपको बहुत - बहुत बधाई

मेरी नई रचना

मेरे अपने

खुशबू
प्रेमविरह

रविकर said...

सटीक अभिव्यक्ति |
आभार आदरेया ||

पुरुषोत्तम पाण्डेय said...

गम गलत करने का ये तरीका, सुरमई शाम के नाम अच्छा है.