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Friday, January 11, 2013

ओ दामिनी ओ दामिनी

न हम सब जानते थे तुमको
न  कोई पहचान थी हमारी
थी कौन,क्या नाम था तुम्हारा
थी किस माँ-बाप की दुलारी
पर हर दिल अजीज बन गयी
आज तुम आवाज हो हमारी \

 दाग दामन में लगी दामिनी
 के ,मिटा तभी हम पायेंगे
आँचल से हवा कर-कर के
प्रतिशोध की अगन से जब
एक-एक दरिंदों की दरिंदगी
में सरेआम आग हम लगायेंगे \

कैसे दिखायें भड़ास सीने में
हद से ज्यादा धधक रही हमारी
हम ममता की मूरत को कोई
न समझे कमजोरियां हमारी
हम आग है,शोला,चिंगारी ना
देखो मौन खामोशियां हमारी \

नव वर्ष का ऊल्लास बेटी नहीं
तेरे दुःख में किसी ने भी मनाया
तुम्हीं,भूचाल,जन-जागृति में
लायीं,तुमने सोते से है जगाया
जमीं आसमां का कितना कोना
हम सबको तुम्हीं ने है बताया \

कड़ककर नाम के अनुरूप तुम
क्यों पंचतत्व में विलीन हो गयीं
दुनियां की आँखों में देकर नमीं
आत्माओं को गमगीन कर गयीं
नारी चेतना में भर दी हो गर्जना
पुख्ता मशाल की जमीन कर गयी \

तेरी चिता पर पुष्प गुबार का,
और दृढ संकल्प का चढ़ाये हम
गहन,चिंतन-मनन करते रहे
मोमबत्तियां,कंदीलें जलाये हम
कंपकपाती ठिठुरन भरी रात में
जागे खुद दुनियां जगाये हम \

मन का उद्वेलन कागजों पर
अश्रुपूरित आँखों से है उतारी
शब्दों को दर्द का लिबास दे
की लेखनी तलवार सी दुधारी
हैवानों के अमानुषिक बर्ताव ने
दिल में भरी झकझोरकर हुंकारी \












4 comments:

Dr. shyam gupta said...

सुन्दर कविता व भावाव्यक्ति....

"नव वर्ष का ऊल्लास बेटी नहीं
तेरे दुःख में किसी ने भी मनाया" ---- यह कुछ संवेदनशील लोगों के लिए आंशिक सच होसकता है ...
--- हाँ, सच तो यह है कि ..इसी भारत में हर नगर में तमाम युवाओं ने अंग्रेज़ी नव-वर्ष पर खूब डांस किये हैं रात भर पी-पी कर....

Anita (अनिता) said...

दिल में धधकती हुई ज्वाला मशाल बनकर जलती रहेगी ...
~सादर!!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (13-12-2013) को (मोटे अनाज हमेशा अच्छे) चर्चा मंच-1123 पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Kalipad "Prasad" said...

दाग दामन में लगी दामिनी
के ,मिटा तभी हम पायेंगे
आँचल से हवा कर-कर के
प्रतिशोध की अगन से जब
एक-एक दरिंदों की दरिंदगी
में सरेआम आग हम लगायेंगे :
आग दिल में जलती रहना चाहिए
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