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Thursday, January 24, 2013

सपनो के सौदागर से

         सपनो के सौदागर से

बहुत जिन्दाबादी के नारे सुने,
                        अब असली मुद्दों पे आओ जरा
करेंगे ये हम और करेंगे वो हम,
                      हमें कुछ तो कर के दिखाओ जरा
ये जनता दुखी है,परेशान  है,
                       उसे थोड़ी राहत  दिलाओ जरा
ये सुरसा सी बढती चली जारही ,
                      इस मंहगाई को तुम घटाओ जरा
भाषण से तो पेट भरता नहीं,
                        खाना मयस्सर  कराओ जरा
खरचते थे सौ ,मिलते पंद्रह थे,
                       नन्यान्वे  अब दिलाओ  जरा 
गरीबों के घर खाली रोटी बहुत,
                        गरीबों को रोटी  खिलाओ जरा

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

1 comment:

Shiv Kumar said...

देश की यथार्थ स्थिति को अभिव्यक्त करती कविता ..
बहुत ही सुन्दर कविता ....