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Monday, December 3, 2012

''परदानशीं का दर्द''



चलती थी सडकों पे बेनकाब 
   हुस्न ने परदा गिरा दिया 
      जब याद ज़माने ने मुझे 
         उम्र का दरजा दिला दिया \
कैद कर लो हिजाब में 
   शोख़ अदाएं ये मस्त जवानी 
      कह-कह कर बुजुर्गों ने मेरे 
         जिस्म का ज़र्रा जला दिया \
मुड़-मुड़ के देखते थे लोग 
  जिस गली से कूच करती थी
    मेरी बेबसी का खुदा तूने 
      अंजाम ये कैसा सिला दिया \  
इस नलाकाश में बताइए जनाब 
  अदा से मुस्कुराऊँ तो भला कैसे 
     कहाँ से आयी ये पागल शबाब 
       जो मुझे परदा नशीं बना दिया \
रुख पे कैसा लगा ये रुवाब 
   किन अल्फाज में कहूँ लोगों 
      इस बेकसूर हूर को बस 
         तसब्बुर का आईना बना दिया \
 


4 comments:

Madan Mohan Saxena said...

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

यही तो मुसीबत होती है... खूबी भी जब दुश्मन बन जाती है...
~सादर!!!

shailrachanablogspotin said...

सक्सेना जी आज आप का भी ब्लॉग पढ़ा ,आप अच्छा लिखते हैं ,गजलें अच्छी लगीं \इसी तरह उत्साह वर्धन
करते रहिये

shailrachanablogspotin said...

अनीता जी बहुत-2 धन्यवाद जो कि आपने पढ़ा और सराहा, आपके ब्लॉग को पढ़कर ख़ुशी हुई काफी अच्छा लगा, आप मेरा भी ब्लॉग देखिये " शैल रचना ब्लॉग स्पॉट इन" अभी सुसज्जित तो नहीं है, अभी बस शुरुआत है /