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Thursday, December 13, 2012

''इक झलक जो देखा उनको''



मन को भा गई सांवली सुरतिया
मैं तो हुई बावरी सखी ,
जाने कब होगी उनसे प्यारी बतिया
मैं तो हुई बावरी सखी ।
आते-जाते उनसे मुलाकात बस हुई
आँखों-आँखों में ही सिर्फ बात बस हुई ,
सपनों में रोज-रोज मेरे आने है लगा
रोम-रोम मेरा गुदगुदाने है लगा ,
जाग-जाग के बितायी सारी रतिया
मैं तो हुयी बावरी सखी ,
जाने कब ....मन को .... ।
शाम से बैठी हूँ घर का खोल झरोखा
इक झलक की चाह वो है सबसे अनोखा ,
धड़कनों को छेड़ा है नाज़ो अंदाज ने
ख़ुश्बू की तरह छाया है जां ओ जहान में ,
डगर-डगर पर बिछायी दोनों अँखिया
मैं तो हुई बावरी सखी ,
जाने कब ......मन को ......।
पूछता ज़माना क्या हुआ है जानेमन
नैना खोये-खोये चाल ढाल बांकपन ,
इक नजर के जादू की है ये दीवानगी
दिल्लगी के माजरा की ये रवानगी ,
राजे दिल की छुपाई सबसे बतिया 
मैं तो हुई बावरी सखी ,
जाने कब .......मन को .......।   

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