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Thursday, December 13, 2012

मधुर मिलन की पहली रात

  मधुर मिलन की पहली रात

मेंहदी से तेरे हाथ रचे ,और प्यार रचा मेरे मन में
मुझको पागल सा कर डाला ,तेरी शर्मीली चितवन में
तेरे कंगन की खन खन सुन ,
                         है खनक उठी  मेरी नस नस
तेरी मादक,मदभरी महक,
                         है खींच रही मुझको बरबस 
नाज़ुक से हाथों को सहला ,
                         मन बहला नहीं,बदन दहला
हूँ विकल ,करू किस तरह पहल,
                         यह मिलन हमारा है पहला 
मन हुआ ,बावला सा अधीर,है ऐसी अगन लगी तन में
मेंहदी से तेरे हाथ रचे, और प्यार रचा मेरे   मन में
मन का मयूर है नाच रहा,
                             हो कर दीवाना  मस्ती में
तुमने निहाल कर दिया मुझे,
                               बस कर इस दिल की बस्ती में
चन्दा सा मुखड़ा दिखला दो,
                                क्यों ढका हुआ  घूंघट पट से
मतवाली ,रूप माधुरी का,
                                रसपान करूं ,अमृत घट से
सब लाज,शर्म को छोड़ छाड़ ,आओ बंध  जाये  बंधन में
मेंहदी से तेरे  हाथ रचे ,और प्यार रचा  मेरे मन   में

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 
                      

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