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Friday, November 9, 2012

हो स्वागत कैसे लक्ष्मी का

 

हो स्वागत कैसे लक्ष्मी का
अन्धकार ने घेरा है
तेल बाती लायें कहाँ से
महँगाई ने घेरा है
हर ओर उदासी छाई
कमर तोड़ महँगाई है
बाजार भरा पड़ा सामान से
पर धन परिसीमित करना है
चंद लोगों ने ही त्यौहार पर
कुछ नया खरीदा है
बाकी तो रस्म निभा रहे हैं
बेमन से पटाखे ला रहे हैं
बच्चों का मन रखने के लिए
गुजिया पपड़ी बने कैसे
मँहगाई की मार पड़ी है
खील बताशे तक मँहगे हैं
क्रेता का मुँह चिढ़ा रहे हैं
शक्कर की मिठास भी
कम से कमतर होने लगी है
हर चीज फीकी लगती है
जब भाव उसका पूछते हैं
मन को कैसे समझायें
देना लेना सब करना है
कहाँ-कहाँ हाथ रोकें
हर बात है समझ से परे
पसरे पैर मँहगाई के
गहरा घना अंधेरा है
फिर भी सब कुछ करना है
क्योंकि यहीं रहना है
हर त्यौहार की तरह
दीपावली भी
मन ही जायेगी
पर आने वाले दो माह का
बजट बिगाड़ कर जायेगी |

आशा

2 comments:

समयचक्र said...

badhiya samayik rachana mishr ji ... badhai

Asha Lata Saxena said...

टिप्पणी हेतु धन्यवाद |दीपावली शुभ और मंगलमय हो |
आशा