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Wednesday, November 21, 2012

जो दिखता है-वो बिकता है

   जो दिखता  है-वो बिकता है

जो दिखता  है -वो बिकता है
बिका हुआ रेपिंग पेपर में ,
                          छुप प्रेजेंट कहाता है
पर जब रेपिंग पेपर फटता ,
                          तो फिर से दिखलाता है
बन जाता प्रेजेंट ,पास्ट,
                     ज्यादा दिन तक ना टिकता है 
जो दिखता है -वो फिंकता  है
लाख करोडो रिश्वत खाते ,
                         नेताजी ,कर घोटाले
पोल खुले तो फंसते अफसर ,
                           मारे जाते  बेचारे
छुपे छुपे नेताजी रहते ,
                            दोषी  अफसर दिखता  है
जो दिखता है-वो पिसता है
  गौरी का रंग गोरा लेकिन,
                         खुला खुला जो अंग रहे
धीरे धीरे पड़ता काला ,
                           जब वो तीखी धुप सहे
छुपे अंग रहते गोरे ,
                         और खुल्ला ,काला दिखता  है
जो दिखता है -वो सिकता  है 
                                            
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

1 comment:

Madan Mohan Saxena said...


बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
http://madan-saxena.blogspot.in/
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