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Monday, November 12, 2012

'मन से मावस की रात भगाएं'

आओ मिलजुल कर हम सब,तम् के नीचे नेह का दीप जलाएं \

आँचल भरें तमस के उजियारा,घर पूनम की रात मीत बुलायें \

स्नेह की ऐसी अलख जगायें,मन से मावस की कारी रात भगाएं \

इक दूजे के गम शूल खींचकर,दुःख-दर्द गले मिल बांटें आओ \

कण-कण प्रकाश की लौ फेरकर शुभ दीवाली सुपर्व मनायें आओ 

करें बात जब लगे गीत सा,झिलमिल फूटें सितारे फुलझड़ियों सी \

रोमांच भरा हो  मिलन हमारा,लगे अट्टहास पटाखों के लड़ियों सी \

समत्व सत्ता का आलोक बिछाकर,घर-घर जाकर मतभेद मिटाकर \

 बधाई देवें खील बताशे खाकर ,खुशियों की मन में लहर जगाकर \

बरस का महान  पर्व ये बन्धु,कड़वाहट का आओ म्लेच्छ भगायें \

स्नेह की धार से नवकिरण बार, एकता का जगमग दीप जलायें \


3 comments:

रविकर said...

दीप पर्व की

हार्दिक शुभकामनायें
देह देहरी देहरे, दो, दो दिया जलाय-रविकर

लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

Madan Mohan Saxena said...

बेह्तरीन अभिव्यक्ति .बहुत अद्भुत अहसास.सुन्दर प्रस्तुति.
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये आपको और आपके समस्त पारिवारिक जनो को !

मंगलमय हो आपको दीपो का त्यौहार
जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार..

shailrachanablogspotin said...

आपको भी दीवाली की हार्दिक बधाई