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Sunday, May 6, 2012

ग़ज़लगंगा.dg: जाने किस-किस की आस होता है

जाने किस-किस की आस होता है.
जिसका चेहरा उदास होता है.

उसकी उरियानगी पे मत जाओ 
अपना-अपना लिबास होता है.

एक पत्ते के टूट जाने पर 
पेड़ कितना उदास होता है.

अपनी तारीफ़ जो नहीं करता 
कुछ न कुछ उसमें खास होता है.

खुश्क होठों के सामने अक्सर 
एक खाली गिलास होता है.

हम खुलेआम कह नहीं सकते 
बंद कमरे में रास होता है.

वो कभी सामने नहीं आता 
हर घडी आसपास होता है.

----देवेंद्र गौतम 

ग़ज़लगंगा.dg: जाने किस-किस की आस होता है:

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2 comments:

veerubhai said...

हम खुलेआम कह नहीं सकते
बंद कमरे में रास होता है.
अनुभव का एक दायरा फलसफा -ए - ज़िन्दगी लिए रहतीं हैं आपकी ग़ज़लें .अब इससे बढ़िया शैर और क्या हो सकता है -
एक पत्ते के टूट जाने पर ,
पेड़ कितना उदास होता है .

नीलांश said...

v nice ghazal