*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Saturday, April 21, 2012

मिलन संगीत

मिलन संगीत

होठों से निकल साँसे ,जब,

बांसुरी के अंतर्मन से गुजरती है,
और तन के छिद्रों पर,
उंगलियाँ संचालन करती है
तो मुरली की मधुर तान गूंजने लगती है
तबले और ढोलक की,
कसी हुई चमड़ी पर,
हाथ और  उंगलियाँ,
थाप  जब देतें है,
तो   फिर' तक धिन धिन' की,
स्वरलहरी  निकलती है
सितार के कसे हुए तारों को,
जब उंगुलियां हलके से,
स्पर्श कर ,छेड़ती है,
तो सितार  के मधुर स्वर,झंकृत हो जाते है
पीतल के मंजीरे,
जब आपस में दोनों ,मिल कर टकराते है
खनक खनक जाते है
मिलन की बेला में,
गरम गरम साँसे,
उद्वेलित होकर के,
रोम रोम में तन के,
मधुर तान भरती है
स्वर्णिम तन की त्वचा पर,
हाथ और उंगलियाँ,जब जब थिरकती है
मन के तार तार,
जब पाकर प्यार,
उँगलियों की छुवन से,झंकृत हो जाते है
मिलन के उन्माद में,
मंजीरे की तरह,
जब तन से तन टकराते है
ये साज सब के सब,
एक साथ मिल कर जब,
लगते है बजने तो,
जीवन में मिलन का मधुर संगीत,
गुंजायमान हो जाता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


No comments: