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Wednesday, March 28, 2012

अनकहा सच


कुछ हमने कहा कुछ तुमने सुना
पर अनकहा बहुत कुछ छूट गया |
न कोई संबोधन न कोई रिश्ता
न तोल सका भावों को मन के |
था मन में क्या  न जता पाया
न कोई उपहार दिला पाया |
छिप-छिप कर बात कही मन की
शब्दों में उसे न सजा पाया |
सम्वाद रहित अनजाना रिश्ता
आँखों से भी न जता पाया |
न लिया न दिया कभी कुछ भी
यह कमी सदा ही खलती रही |
सोचा क्या उपहार जरूरी है
यह तो एक कमजोरी है |
यदि अलग हट कर सोचा होता
मन की आँखों से देखा होता
मेरा अंतर टटोला होता
दो बोल प्यार के बोले होते
तुम मुझे  पाते निकट अपने|
नए सपने नयनों में पलते
कुछ भी अनकहा न रहा होता |
कोई उपहार नहीं आवश्यक 
यदि दिल दौलत को चुना होता |

आशा

5 comments:

meenakshi said...

"कोई उपहार नहीं आवश्यक
यदि दिल दौलत को चुना होता |"
bahut sundar panktiyan hain ; Ashaji.vastwik sach to yahi hai ..bas ek samajh ki baat hoti hai ..

shubhkamnaon ke sath
Meenakshi Srivastava
meenugj81@gmail.com

dasarath said...

यदि अलग हट कर सोचा होता
मन की आँखों से देखा होता
मेरा अंतर टटोला होता
दो बोल प्यार के बोले होते
तुम मुझे पाते निकट अपने|

बहुत सुंदर रचना है

DINESH PAREEK said...

अति सुन्दर बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति...
सार्थक
दिनेश पारीक
मेरी नई रचना
कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: माँ की वजह से ही है आपका वजूद:
http://vangaydinesh.blogspot.com/2012/03/blog-post_15.html?spref=bl

Sadhana Vaid said...

सारगर्भित सुन्दर रचना ! अति सुन्दर !

Asha Saxena said...

इस ब्लॉग पर आने के लिए हार्दिक धन्यवाद |
आशा