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Tuesday, March 20, 2012

दुनिया एक छलावा है



वे भी अपने न हुए ,
विश्वास था जिन पर कभी ,
सफलता कभी हाथ नआई ,
असफलता ने ही माथा चूमा ,
साया तक साथ छोड़ गया ,
तपती धूप में जब खड़ा हुआ ,
कभी सोचा भाग्य ही खराब है ,
हर असफलता पर कोसा उसे ,
जो दुनिया रास नहीं आई ,
बार-बार धिक्कारा उसे ,
मेरी बदनसीबी पर ,
चन्द्रमा तक रोया ,
प्रातः काल उठते ही ,
पत्तियों पर आँसू उसके दिखते ,
चाँदनी तक भरती सिसकियाँ ,
बादलों की ओट से ,
फिर भी जी रहा हूँ ,
ले लगन ओर विश्वास साथ ,
साहस अभी भी बाकी है ,
आशा की किरण दिखाई देती है ,
सफल भी होना चाहता हूँ ,
पर इतना अवश्य जान गया हूँ ,
दुनिया एक छलावा है ,
वह किसी की नहीं होती ,
जब भी बुरा समय आये ,
वह साथ नहीं देती |
आशा

4 comments:

expression said...

bahut sundar..........

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

सुन्दर प्रस्तुति.... बहुत बहुत बधाई.....

Asha Saxena said...

आपलोगों को यह कविता अच्छी लगी जान कर बहुत प्रसन्नता हुई |इसी प्रकार स्नेह बनाए रखें
आशा

***Punam*** said...

बहुत सुन्दर कविता.....!!