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Wednesday, February 22, 2012

वादा






 लम्हे लम्हे गिनते गिनते
हमने अपनी जिन्दगी गुजार दी
क्यों  की उसने वादा किया था
कि फिर कभी अपनी मुलाकत होगी..

रचनाकार- प्रदीप तिवारी

2 comments:

veerubhai said...

बहुत खूब -कागा सब तन खाइयो ,चुन चुन खाइयो ,मांस और दो नैना मत खाइयो ,पिया मिलन की आस .

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन भाव ...