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Friday, February 3, 2012

क्षणिकाएं

(१) उम्र ने दी जो दस्तक तेरे दरवाजे पर ,
तेरा मन क्यों घबराया ,
इस जीवन में है ऐसा क्या ,
जिसने तुझे भरमाया ,
अब सोच अगले जीवन की ,
मिटने को है तेरी काया|
(२) तेरा मेरा बहुत किया ,
पर सबक लिया न कोई ,
शाश्वत जीवन की मीमांसा ,
जान सका न कोई ,
धू धू कर जल गई चिता ,
पर साथ न आया कोई |

आशा
(

5 comments:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर सार्थक रचना। धन्यवाद।

vidya said...

बहुत सुन्दर क्षणिकाएं..

सादर.

dinesh aggarwal said...

वाकई क्षणिकायें बहुत ही सराहनीय हैं.......
कृपया इसे भी पढ़े-
नेता, कुत्ता और वेश्या

Asha Saxena said...

टिप्पणी हेतु आप लोगों का बहुत बहुत आभार |
आशा

हास्य-व्यंग्य का रंग गोपाल तिवारी के संग said...

Behtarin rachna.