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Thursday, January 12, 2012

मन की बात

बिना जाने मन की बात कोई
चाहती नहीं की तुम से कुछ कहूँ 
कहा यदि मैंने कुछ तुमसे ,
और पूरा न हो सका तुमसे ,
यह सब नहीं होगा पसंद मुझे ,
कि मैं दंश अवमानना का सहूँ |
कहा हुआ पूरा हो तो
कहीं कुछ अर्थ निकलता है ,
यदि पूरा न हो पाया तो ,
मन अशांत विचरता है ,
फिर आता है मेरे मन में ,
कि मैं तुम से कुछ भी न कहूँ |
दुःख होने लगता है ,
अधूरी अपेक्षा रखने से ,
विश्वास टूट जाता है ,
मन चाहा न होने से |
तब कई शब्द घुमड़ने लगते हैं ,
हृदय में घर करने लगते हैं ,
कभी सोचने लगती हूँ ,
मुझमें इतनी लाचारी क्यूँ है ?
फिर मन में विश्वास जगाती हूँ ,
खुद ही सब करना होगा ,
यही मन में भरना होगा ,
तब नहीं चुभेगा दंश कोई ,
मैं नहीं चाहती बैसाखी अभी |

आशा

3 comments:

vidya said...

बहुत बढ़िया...
मानसिक स्वावलंबन ज़रुरी है...

Sadhana Vaid said...

अपने आत्मबल का आकलन कर उसकी क्षमताओं को पहचानना होगा तभी सारे कार्य सिद्ध हो सकेंगे ! बहुत सुन्दर रचना !

prerna argal said...

आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स मीट वीकली (२६) मैं शामिल की गई है /आप मंच पर आइये और अपने अनमोल सन्देश देकर हमारा उत्साह बढाइये /आप हिंदी की सेवा इसी मेहनत और लगन से करते रहें यही कामना है /आभार /लिंक है
http://www.hbfint.blogspot.com/2012/01/26-dargah-shaikh-saleem-chishti.html