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Thursday, January 26, 2012

निरंतर महाभारत


हर एक में कहीं
भीतर ही होता है कृष्ण
और होता है
एक निरंतर महाभारत
भीतर ही भीतर,
क्यों ढूढते है हम सारथी
जब स्वयं में है कृष्ण,
मैं तुम और हम में बटा ये चक्रव्यूह
तोड़ता है भीतर का ही अर्जुन,
माटी है और सिर्फ माटी है
हर रोज यहां देखता हुं
मैं तुम और हम का कुरुक्षेत्र !!

3 comments:

रविकर said...

आज के चर्चा मंच पर आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
का अवलोकन किया ||
बहुत बहुत बधाई ||

veerubhai said...

हर रोज यहां देखता हुं
मैं तुम और हम का कुरुक्षेत्र !!
अभिव्यक्ति को मानो पंख लग गए हैं अब इससे सुन्दर अभिव्यक्ति और क्या हो सकती है भौतिक द्वंद्व को उकेरा है अनायास निर प्रयास .

रौशन जसवाल विक्षिप्त said...

रविकर और Veerubhai जी आपका आभार मैं प्रोत्‍साहित हूआ। आशा है आपका स्‍नेहाशिर्वाद निरन्‍तर मिलता रहेगा।