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Sunday, January 22, 2012

"कसक".........(लक्ष्मीकांत त्रिपाठी की कहानी)

स्लीपर कोच में घुसने के बाद मैं अपने लिए आरक्षित बर्थ पर आराम से लेट गया. फिर मैं कश्यप की पांडुलिपि को बैग से निकाल कर पढ़ने लगा. क्रमशः मेरे भीतर कश्यप कसकने लगा.
कुछ देर बाद ट्रेन ने सरकना शुरू किया.
‘‘ खाना...खाना...खाना बोलिए साहब! खाना...’’ की गूँज बार-बार मेरे कानों से टकराने लगी. मैंने पलट कर आवाज़ की तरफ देखा.
‘‘ खाना लगा दूँ साहब! ’’ एक अधेड़ आदमी मुझसे पूछ रहा था.
‘‘ नहीं, रहने दो!...’’ मैंने धीरे से कहा.
‘‘ एकदम सादा खाना है साहब! तीस रूपये थाली...दाल है, दो तरह की सब्जी है,चार चपाती,चावल,दही, अचार...’’
‘‘ तुम जाओ! मुझे भूख नहीं है.’’ मैंने जोर से कहा.
‘‘ नहीं भूख है तो मत खाइए! चिल्ला क्यों रहे हैं ? ‘‘ उस आदमी ने बुरा-सा मुंह बनाते हुए कहा. मैं झेंप गया. फिर वह आदमी खाना...खाना बोलिए साहब! खाना...कहते हुए आगे बढ़ गया. मैंने करवट बदल लिया. एकाएक वह लड़का मेरी बंद आँखों के सामने प्रत्यक्ष होने लगा जिसे कुछ देर पहले मैं प्लेटफार्म नंबर एक पर छोड़ आया था.
कबीर सम्मान समारोह में भाग लेने के लिए मैं बस द्वारा कल रात में ही गोरखपुर से इलाहाबाद आ गया था. सम्मान समारोह के मुख्य कर्ता-धर्ता नरेन्द्र जी मेरे पुराने मित्रों में से हैं. उन्होनें निमंत्रण-पत्र भेजने के साथ ही मुझे फोन करके समारोह में भाग लेने के लिए अनुरोध किया था.
राह-खर्च, रुकने-ठहरने आदि के बारे में न ही उन्होंने मुझे कुछ बताया और न ही मैंने उनसे इस बावत कुछ पूछा ही. इस संबंध में कुछ पूछना भी एक तरह की बेशर्मी ही होती. उनकी बातों से मुझे पता चला कि मात्र वित्तीय कारणों से समारोह के आयोजन में विलंब हुआ. पुरस्कार की धनराशि उपलब्ध कराने वाले सेठ ने अपने जवान बेटों के दबाव में आकर आयोजन से हाथ खींच लिया था. कुछ इधर-उधर से सहयोग मिल गया था. एक बालू ठेकेदार ने इस शर्त पर कि मंच पर उसे भी माल्यार्पण के लिए बुलाया जाएगा,पाँच हजार रूपये का सहयोग दिया था. एक स्थानीय नेता ने पाँच हजार का सहयोग इस आग्रह के साथ दिया था कि उसे भी कुछ कहने का मौका दिया जाएगा. बाकी खर्चों का वहन वे स्वंय कर रहे थे.
रात में पौने नौ बजे बस से उतरा तो नरेन्द्र जी स्टेशन पर एक अन्य व्यक्ति के साथ मेरा इंतजार करते हुए मिले. दूसरे आदमी का परिचय कराते हुए नरेन्द्र जी ने कहा-‘‘ आप कश्यप जी हैं, बनारस से आए हैं. आप कविता की एक अनियतकालीन पत्रिका के संपादक हैं और स्वंय भी बहुत अच्छे कवि हैं. अभी-अभी ये भी आए है.‘‘
मैंने हाथ बढ़ाकर कश्यप से हाथ मिलाया.
स्टेशन के बाहर स्थित एक शाकाहारी रेस्टोरेंट में हम दोनों को खाना खिलाने के बाद नरेन्द्र जी हम दोनों को उस होटल में ले गये जिसमें हम दोनों को ठहरना था.
‘‘ रूम नंबर पन्द्रह में आप दोनों के  ठहरने की व्यवस्था है, डबलबेड का है. ’’ नरेन्द्र जी ने मुझे बताया.
मुझे कश्यप जी के साथ डबलबेड शेयर करना था.
हम दोनो को रूम नंबर पन्द्रह में पहुँचाने के बाद नरेन्द्र जी चले गए.
‘‘ आप भी कविता लिखते हैं ? ’’ कश्यप ने एकाएक मुझसे पूछा.
‘‘ नहीं, मैं समालोचक हूँ.’’ मैंने उसे बताया.
‘‘ चलिए! अच्छा है आप कविता नहीं लिखते हैं.’’ कहने के बाद कश्यप ने जोर से ठहाका लगाया. मैं चौंक गया.
‘‘ आजकल कविता-सविता कोई पढ़ता तो है नहीं...’’ कश्यप ने आगे जोड़ा. फिर वह मौन हो गया. उसकी बोझिल आँखों में घनी उदासी पसर गई.
‘‘ क्या आपकी कोई किताब भी छपी है ? ’’ मैंने बातचीत को आगे बढ़ाते हुए कहा.
‘‘ किताब तो तैयार है, लेकिन छप नहीं पा रही है. कई प्रकाशकों से संपर्क किया, सबने टका-सा जवाब दे दिया. पता नहीं कैसे इलाहाबाद के एक प्रकाशक को पता चल गया कि मैं अपनी कविताओं की किताब छपवाना चाहता हूँ. पिछले हफ़्ते वह मुझसे मिलने आया था. उसने बताया कि वह बड़े-बड़े अधिकारियों की कई किताबें छाप चुका है. अब मेरी किताब छापना चाहता है. मैं बहुत खुश हुआ और आश्चर्यचकित भी. मैंने झट से अपनी पांडुलिपि उसे थमा दिया. कुछ देर तक पन्नों को उलटने-पलटने के बाद वह बोला-‘‘ किताब तो छप जाएगी, लेकिन आपको दस हजार रूपये देने होंगे. ’’ मेरा सारा उत्साह ठंडा पड़ गया.
‘‘ देखिए! मेरी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. दो-दो जवान बेटियाँ सिर पर सवार हैं. उनकी शादी करनी है. मैं इतने पैसों का इंतजाम नहीं कर पाऊँगा...’’
‘‘ दस हजार से कम में नहीं हो पाएगा...’’ कहते हुए उसने मेरी पांडुलिपि वापस कर दिया...’’ कश्यप मुझे बताने लगा.
मैं सोने की कोशिश में बार-बार करवटें बदलने लगा.
ट्यूब लाइट की तीखी रोशनी के चलते मुझे नींद नही आ रही थी. कश्यप अपने झोले से एक पुरानी डायरी निकाल कर पढ़ने लगा.
जब रात के बारह बज गए और मुझे नींद नहीं आई, मैंने धीरे से कहा-‘‘ लगता है आप रात में देर तक जगते हैं...’’
कश्यप ने पहले तो मुझे घूरकर देखा. फिर बोला-‘‘ देर तक!...अरे! कभी-कभी तो मैं पूरी रात जग जाता हूँ, जब कोई बात मन में कसकने लगती है. ’’
मैं करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगा.
साढ़े बारह बजे तक पढ़ने के बाद बिस्तर से उठते हुए कश्यप ने अपनी डायरी मुझे पकड़ाते हुए कहा-‘‘ इसे आप रख लीजिए! यही मेरी पांडुलिपि है...’’
‘‘ लेकिन इसका मैं क्या करूंगा ? ’’ मैंने चौंकते हुए कहा.
‘‘ मुझे नहीं लगता कि मेरे जीते-जी मेरी किताब छप पाएगी. यदि कभी संभव हो तो आप मेरी किताब छपवा दीजिएगा! भले ही किसी और के नाम से छपवा दीजिएगा! मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी.’’ कश्यप ने याचनापूर्ण लहजे में कहा. उसके मुंह से निकलने वाले शब्द लड़खड़ा रहे थे.
‘‘ अरे! ऐसा नहीं होगा. अगर आप की किताब छपेगी तो आप के नाम से ही छपेगी. आप निश्चिंत रहिए! ’’ मैंने कश्यप को आश्वस्त करते हुए उसकी पांडुलिपि को अपने बैग में रख लिया.
‘‘ अब मैं लाइट बंद कर देता हूँ, नहीं तो आपको सोने में दिक्कत होगी. ’’ कहते हुए कश्यप ने ट्यूबलाइट का स्विच बंद कर दिया. कमरे में घना अंधेरा पसर गया.
लेकिन तब तक मेरी नींद उचट चुकी थी. रात भर मैं ठीक से सो नहीं पाया.
मैंने सुबह सात बजे बिस्तर छोड़ दिया. कश्यप गहरी नींद में सो रहा था. उसके चेहरे पर निश्चिंता छाई हुई थी. मैं फ्रेश होने के लिए टॉयलेट में घुस गया.
चाय पीने के बाद एकाएक मेरे मन में आया कि मुझे नरेन्द्र जी पर और अधिक वित्तीय बोझ नहीं डालना चाहिए. लौटने के लिए स्वंय ही रिजर्वेशन करा लेना चाहिए.
रिसेप्शन काउंटर पर जाकर वहाँ पर बैठे होटल के कर्मचारी से मैंने पूछा,-‘‘ आज रात में मुझे गोरखपुर जाना है. क्या आप मेरा रिजर्वेशन चौरीचौरा एक्सप्रेस में करवा देंगे ? ’’
‘‘ ठीक है, मैं आपका रिजर्वेशन करवा दूँगा.’’ कर्मचारी ने मुझे आश्वस्त किया.
समारोह में भाग लेने के लिए मैं कश्यप के साथ ठीक साढ़े नौ बजे होटल से बाहर निकला.समारोह का दूसरा सत्र लगभग चार बजे बजे समाप्त हुआ. छः बजे शाम से कवि गोष्ठी होनी थी. लेकिन नींद और थकान के चलते मैं उसमें भाग लेने की स्थिति में नहीं था. मैंने इसके लिए नरेन्द्र जी से क्षमा मांग लिया. साथ ही मुझे ट्रेन पकड़ने के लिए हर हाल में साढ़े आठ बजे तक स्टेशन पहुँचना था. सद्भावना एवं आह्लाद से परिपूर्ण वातावरण में समारोह में आए लोगों एवं नरेन्द्र जी से मैंने विदा लिया. चलते वक़्त नरेन्द्र जी ने मुझे एक लिफाफा पकड़ाते हुए कहा-
‘‘ कुछ आवागमन खर्च के लिए है. रख लीजिए! ’’
मैनें कुछ संकोच के साथ लिफाफा लेकर जेब में रख लिया.
शाम पाँच बजे मैं होटल के अपने कमरे में आ गया.
कमरे में आने के बाद सबसे पहले मैंने जेब से लिफाफा निकाल कर देखा. लिफाफे के अन्दर से पाँच सौ रूपये का एक नोट निकला. नोट को लिफाफे में रखने के बाद मैंने लिफाफे को जेब में डाल लिया. फिर बिस्तर पर आराम की मुद्रा में लेट गया. मुझे झपकी आने लगी.
अर्ध-निद्रा की स्थिति में मुझे लगा जैसे कोई मेरे कमरे का दरवाजा पीट रहा है. पलकों को उंगलियों से मसलते हुए मैंने बिस्तर से उठ कर दरवाजा खोला.सामने होटल का एक कर्मचारी खड़ा था.
‘‘सर! आपका टिकट...’’ कर्मचारी ने मुझे टिकट पकड़ाते हुए कहा.
मैंने उससे टिकट लेकर जेब के हवाले किया.
ठीक आठ बजे मैंने रिक्शे से रेलवे स्टेशन के लिए प्रस्थान किया. स्टेशन परिसर में जैसे ही मैंने प्रवेश किया, दस-ग्यारह साल का एक बेहद दुबला-पतला लड़का मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया.उसकी नाजुक हथेलियों में गुटखे के कई पाउच लटक रहे थे.
‘‘ गुटखा ले लीजिए साहब! बहुत अच्छा गुटखा है. इसका असर काफी देर तक रहता है.’’ लड़के ने मचलते हुए कहा.
‘‘ मैं गुटखा नहीं खाता.’’ कह कर मैं आगे बढ़ गया.
प्लेटफार्म नंबर एक पर आने के बाद बार-बार हिन्दी एवं अंग्रेजी में हो रही उद्घोषणाओं से मुझे पता चला कि चौरीचौरा एक्सप्रेस बस थोड़ी ही देर में आने वाली है. प्लेटफार्म पर काफी भीड़-भाड़ थी. मैं एक जगह खड़ा हो कर ट्रेन की प्रतीक्षा करने लगा.
तभी वह लड़का फिर मेरे सामने आकर खड़ा हो गया.
‘‘ ले लीजिए साहब! बस एक ही ले लीजिए.’’ लड़के ने धीरे से कहा.
‘‘ मैंने कहा न कि मैं गुटखा नहीं खाता.’’ मैंने झल्लाते हुए कहा.
‘‘ लेकिन एक बार खा के तो देखिए साहब! मजा आ जायेगा...’’ लड़का मुझे समझाने लगा.
‘‘ यार! तुम भी अज़ीब लड़के हो.यह तुम्हारे पढ़ने-लिखने की उम्र है और तुम गुटखा बेच रहे हो. जाने कैसे हैं तुम्हारे माँ-बाप भी जो..’‘ मैंने  लड़के को बुरी तरह से झिड़क दिया.
लड़के के चेहरे पर अचानक घनी उदासी पसर गयी. वह कुछ रुंआसा-सा हो कर मुझे एकटक देखने लगा.
‘‘ तुम्हारे पिता जी क्या काम करते हैं ? ’’ मैंने धीरे से पूछा.
‘‘ पिता जी नहीं हैं साहब! बस माँ भर है...’’ लड़के ने मुझे बताया.
‘‘ अरे! कब मरे!...’’ मैंने अफसोस व्यक्त किया.
‘‘ मेरे पिताजी जिन्दा हैं. ’’
‘‘ जिन्दा हैं! फिर भी तुम...’’ मैंने लड़के को आश्चर्य से भर कर देखा.
‘‘ माँ बताती है कि जब मैं बहुत छोटा था, पिता जी एक दूसरी औरत से शादी करके उसके साथ सूरत चले गये.फिर कभी नहीं लौटे.माँ हमेशा बीमार रहती है.पहले एक परचून की दुकान थी जो बाद में बिक गयी. आज घर में खाना भी नहीं बना. सुबह से कुछ भी खाया नहीं हूँ.‘’ लड़के ने अटकते हुए कहा.
मुझे सचमुच बहुत अफसोस हुआ.
तभी चौरीचौरा एक्सप्रेस घड़घड़ाते हुए आई और एक झटके साथ रुक गयी. प्लेटफार्म पर ट्रेन के रुकते ही वहाँ पर खड़े यात्री धक्का-मुक्की करते हुए ट्रेन के अन्दर घुसने की कोशिश करने लगे.
‘‘ इसमें कुछ रूपये हैं. तुम खाना खा लेना और अपनी माँ को भी खिलाना!...’’ मैंने जेब से लिफाफा निकाल कर लड़के की तरफ बढ़ाते हुए कहा. लड़के ने चुपचाप लिफाफा ले लिया.
मैं ट्रेन की तरफ बढ़ गया.
इस वक़्त भी मैं आराम से लेटा हुआ हूँ. ट्रेन तीव्र गति से मेरे घर की तरफ भागी जा रही है. मेरे सीने में हल्का-हल्का दर्द हो रहा है. मुझे नींद नहीं आ रही है...
अब किसी स्टेशन पर ट्रेन रुकी हुई है. मैंने करवट बदल कर कलाई घड़ी में समय देखा.पौने चार बज चुके हैं. सुबह होने वाली है.
प्लेटफार्म पर मिला वह लड़का एक प्रश्नचिन्ह की तरह मेरा पीछा कर रहा है और मैं उससे दूर, बहुत दूर भाग जाना चाहता हूँ. एकाएक मुझे अपने आप पर घोर आश्चर्य हुआ. जहाँ तक मैं अपने बारे में जानता हूँ, मैं मध्यवर्गीय चेतना से लबरेज एक मामूली इंसान हूँ. बहुत ही बड़ा मक्खीचूस, एक-एक पैसे का हिसाब-किताब करता हूँ. भरसक इसी कोशिश में रहता हूँ कि एक रूपये का काम बारह आने में ही हो जाए. इक्कीस रूपये की सब्जी लेने के बाद सब्जीवाले को बीस रूपये ही देना चाहता हूँ. भले ही एक रूपये छुड़वाने के लिए सब्जीवाले से कुछ देर तक बक-झक करनी पड़े. प्रायः रिक्शेवालों से भी मोलभाव करता हूँ. उन्हें बहुत चालू और मक्कार समझता हूँ. मैं इतना उदार कैसे हो गया ? एक झटके के साथ बिना कुछ सोचे-समझे उस लड़के को मैंने पाँच सौ रूपये कैसे दे दिया ? और इस बात के लिए मुझे अफसोस भी नहीं हो रहा है. कहीं कश्यप की आत्मा मेरे भीतर तो प्रवेश नहीं कर गई है. ट्रेन फिर सरकने लगी है. वह लड़का फिर मेरे मन में कसकने लगा है.
(समाप्त) 


लेखक परिचयः-
लक्ष्मीकांत त्रिपाठी
पता-14/260, इंदिरा नगर,लखनऊ।
मोबा:-9415570824    



3 comments:

sangita said...

आपकी टूटते-सितारों की उडान मेने पढ़ी काव्य संग्रह सार्थक,सुन्दर प्रभावशील है,बधाई |
आज की पोस्ट रोचक तथा सार्थक है |मेरे ब्लॉग पर आपका सदैव स्वागत है |

वन्दना said...

बहुत ही रोचक

Maheshwari kaneri said...

बहुत मार्मिक..