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Tuesday, January 10, 2012

आओ रच दे प्यार तमाम


तुम हो
मैं हूँ
और हंसीं उन्मादी शाम
आओ रच दे प्यार तमाम
अधरों को
अधरों की आशा
नयनों में
स्वप्निल परिभाषा
योवन न होए निष्काम
आओ रच दे प्यार तमाम 
मन की तृस्ना
बंधन आशा 
मौन समर्पण की अभिलाषा
स्पर्शों का 
विस्तृत अंजाम 
आओ रच दे प्यार तमाम 
रेशम रेशम 
केश घटायें
चन्दन चन्दन 
मधुर हवाएं
आयी फिर उन्मादी शाम
आओ रच दे प्यार तमाम 

-कुश्वंश

8 comments:

vidya said...

बहुत सुन्दर..
भीनी भीनी खुशबु ..एहसास से भरी रचना..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कोमल से भाव लिए सुन्दर प्रस्तुति

अनुपमा त्रिपाठी... said...

sunder rachna ...

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

सुन्दर भावों से भरी सुन्दर रचना । बधाई ।
मेरी नई कविता देखें । और ब्लॉग अच्छा लगे तो जरुर फोलो करें ।
मेरी कविता:मुस्कुराहट तेरी

M VERMA said...

बहुत मधुर बहुत कोमल ... वाह

रविकर said...

बहुत बहुत बधाई |
बढ़िया प्रस्तुति ||

veerubhai said...

रेशम रेशम
केश घटायें
चन्दन चन्दन
मधुर हवाएं
आयी फिर उन्मादी शाम
आओ रच दे प्यार तमाम
सुन्दर प्रस्तुति शाम को रंगीन करती हुई .शुक्रिया .