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Wednesday, December 21, 2011

आखिरी पैगाम

ह्रदय स्पंदन बंद हो जाये ,
इस से पहले लौटा दो,
श्वाँस-गति धूमिल पड़ जाये ,  
इस से पहले लौटा दो.
                                                                                 
वायु में अस्तित्व विलीन हो जाये.
इस से पहले लौटा दो|

लौटा दो मुझे मुझको ही,
लौटा दो मेरी राहतें.
तेरी चाहत तो बस धोखा थीं,
लौटा दो मेरी चाहतें|
हाय कितनी पापन हूँ मैं,
खुद को क्या ये कर डाला?

निर्मोही से प्रेम कर के,
खुद को फिर से ही छल डाला|
अभाग्य की देवी बन कर,
स्वयं आत्म-बलि ली सम्मान की,
फिर भी तो तू खुश ना हुआ,
क्यों मान ना की मेरे अरमान की|

अब आखिर जाऊं कहाँ मैं
किसको ये दुःख दिखाऊं बता|
आत्मा है चित्कारती,
ये कहकशा छिपाऊं कहाँ?
साँसे हैं चिंघाड़ती
मुझ पर धड़कन है दहाड़ती,
कैसे अभी तक जिंदा हूँ,
ज़िदगी है निहारती|

ना आना था तुम्हे,तुम नहीं आये|
ना लौटाना था तो नहीं लाये|
अब तलब नहीं कुछ पाने की
ना इंतज़ार फिर बस जाने की
हे ईश! अब ये अंजाम ले ले
ना इंतज़ार फिर आगाज़ की|

कवयित्री परिचयः-
स्वाति वल्लभा राज 
नोयडा/बिहार